श्री अवधूत जी उन गिने चुने प्राणियों में से हैं जिन्हें ऊपर वाले ने गलती से भारत भूमि पर टपका दिया है। अवधूत जी अधिकतर भारतीयों से थोड़ा भिन्न हैं - ये अनाचार, दुराचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचार और सेहत के लिये हानिकारक सभी तरहों के अचारों से कोसों दूर ही रहते हैं। इमानदारी की हद तो ये कि रोज ही लेने के देने पड़ जाते हैं। अवधूत जी एक सच्चे देश भक्त और देश प्रेमी हैं - अपनी मातृ भूमि के लिये कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं। पर बेचारे कुछ कर नहीं पाते हैं तो अपने टीवी के सामने बैठ कर "इंडिया" में कोढ़ की तरह फैले हुये भ्रष्टाचार के बारे में देखते और सुनते हुये अपनी आँखो से तीन चार खारे पानी की बूँदे गिरा देते हैं। अब तो ये अवधूत जी की दैनिक दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बन गया है।
लोग कहते हैं कि भगवान के घर देर है पर अंधेर नहीं। इतने सालों के बाद भगवान को भी अपनी गलती पर ग्लानि हुई कि ऐसी नेक आत्मा को भारत में क्यों ढकेल दिया। प्रभु ने सोचा कि अवधूत जी के लिये कुछ करना चाहिये - बस आव देखा न ताव और आधी रात को अवधूत जी के कुटिया समान घर में अवतरित हो गये। लोग ये भी कहते हैं कि इमानदार आदमी बहुत चैन की नींद सोता है। प्रभु ने चैन की नींद सोते हुये अवधूत जी को झिझोंड़ झिझोंड़ कर बिस्तर से उठा डाला और बोले - वत्स, मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया। उसी त्रुटि का प्रायश्चित करने के लिये मैं तुम्हें दो वरदान दान में देता हूँ। तुम कुछ भी माँग लो।
अब अवधूत जैसा एक सच्चा देश भक्त भला क्या माँगता - झट से बोल दिया, "हे प्रभु! आप मेरी भारत भूमि से सर्वदा के लिये भ्रष्टाचार गायब कर दो।" ये सुन कर प्रभु चिंतित हो गये और बोले, "मैं स्वयं भगवान हूँ और मुझे ये कहते हुये शोभा नहीं देता कि ये कार्य तो स्वयं भगवान के लिये भी दुष्कर है। परंतु मैं अपनी ओर से भरसक प्रयत्न करूँगा। वत्स ये कार्य करने में थोड़ा समय लगेगा - अभी रात्रि हो गयी है, तुम वापस सो जाओ। सम्भवतः जब तुम कल प्रातः काल उठोगे तो तुम्हारी इक्षा पूर्ति हो चुकी होगी।"
प्रभु के इस आश्वासन के बाद अवधूत अब और चैन की नींद सो गया। अगले दिन जब अवधूत जी सो कर उठे तो बड़ा ही विचित्र नज़ारा था। सारा मोहल्ला, गली, शहर सून सान पड़ा था - सारे नर नारी गायब। पूरे शहर में सिर्फ गाय, गधे, कुत्ते, बिल्ली, सुअर और पशु पक्षी बचे थे। बीच बीच में शिशुओं की रोने की अवाज़ भी सुनाई पड़ रही थी। पर अवधूत जी के पड़ोसी, साथी कर्मचारी, घनिष्ठ मित्र, भाई, सगे सम्बन्धी और रिश्तेदार - सभी गायब - उड़न छू। अवधूत से ये सब सहन न हुआ और उसके ह्र्दय से एक मार्मिक चीत्कार गूँज उठी - हे प्रभु!
लोगों से ऐसा भी सुना है कि अपने भक्तों की करुण पुकार पर प्रभु भागे दौड़े चले आते हैं। कम से कम इस बार तो आ ही गये - वत्स क्या समस्या है? ऐसी गुहार क्यों?
अवधूत ने अष्रुपात करते हुये कहा, "प्रभु! ये कैसी मसखरी? मेरे समस्त पड़ोसी, साथी कर्मचारी, घनिष्ठ मित्र, भाई, सगे सम्बन्धी और रिश्तेदार कहाँ गायब हो गये?"
"वत्स तुम्हीं ने तो वरदान माँगा था कि भारत भूमि से सर्वदा के लिये भ्रष्टाचार गायब कर दो। मैंने वही तो किया।"
"पर प्रभु मैं अपने पड़ोसियों, साथी कर्मचारियों, घनिष्ठ मित्रों, भाई, सगे सम्बन्धियों और रिश्तेदारों के बिना नहीं रह सकता हूँ। मुझे वो सब चाहिये।"
प्रभु ने कहा "तथास्तु", और भारत भूमि पर भ्रष्टाचार वापस आ गया।
- अतुल श्रीवास्तव
3 टिप्पणियां:
Mante hun mein ki corruption itna simple topic bhi nahin hai!
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