सोमवार, मई 18, 2020

श्याम स्तुति

वर्ण विभिन्न विस्तृत वसुधा पर, पर सखि मोहे श्याम रंग ही भायो,
तू समझे मैं हो गई बावरी हर पल क्यों श्याम श्याम गुण गायो।

भानु प्रकोप तृष्णा सुलगाये, धरणी बिन जल जब जल जल जाये,
धवल मेघ मारुत संग इतराये, सखि ये काले घन ही मेंह बरसाये।

भोर भये नभ हो सिंदूरी, सखि पुरवैय्या जब जल थल लहराये, 
उषा काल को काली कोयलिया कुहू कुहू कर जियरा बहलाये। 

मैं मृग नयनी, सुंदर बाला, मोरा गोरा वदन सबका मनवा ललचाये,
सखि, कपोल पर ये काला टीका सब निंद्य नयनों से मुझको हर लाये। 

सखि प्रियतम जब कोपित हो जायें, भ्रमर समान यहाँ वहाँ मंडरायें,
मोरे काले लोचन बाण चला पिय को सम्मोहित कर खींच ले आयें।  

पूर्णिमा का चंचल चंदा कांति दिखाने अम्बर में उड़ उड़ जाये,
यदि श्याम निशा न हो ए सखि तो विधु का रजत रूप कैसे दिख पाये।   

जब श्याम, श्याम संध्या को मोरे काले कुंतल में आ छुप जायें,
मोरा गौर वदन काले कुंतल नभ का तेजमयी शशि बन लज्जाये। 

समझ गई क्यों मोहे श्याम रंग ही भायो, क्यों मैं श्याम श्याम गुण गायो,
भिन्न रंग जब होयें समाहित, सत्य यही, तबहूँ श्याम रंग बन पायो। 

सखि मोहे बस श्याम रंग ही भायो।

- अतुल श्रीवास्तव 

स्तुति: प्रशंसा
धरणी: पृथ्वी
धवल: श्वेत 
मारुत: वायु, हवा 
घन: बादल
मेंह: वर्षा 
वदन: चेहरा 
कपोल: गाल 
निंद्य: खराब, अशुभ 
कोपित: नाराज़ 
भ्रमर: भंवरा 
लोचन: नैन, आँख 
कांति: चमक 
विधु: चाँद 
रजत: चाँदी 
शशि: चाँद 
समाहित: एक ही केंद्र में इकट्ठा किया हुआ या एक स्थान पर लाया या आया हुआ

सोमवार, अप्रैल 13, 2020

मुशाहिदा

दूर दूर तलक अब सड़कों पर बस पहियों के निशां ही रह गये हैं,
नीले आसमाँ को ढके वो काले गुबार भी न जाने कहाँ बह गये हैं।

कुछ अजब है माहौल कि अब कानों में सिर्फ सन्नाटा ही है गूँजता, 
क्या फिर से जमेंगी महफिलें आज हर इंसान बस यही है पूछता। 

मोहल्ले के वो सारे अंजुमन जो रेहलत बदौलत हो रहे थे बरबाद, 
वक्त के इस हेर फेर में फिर से खुद बखुद हो रहे हैं आबाद।  

अजब इत्तेफ़ाक ये है कि दूरियाँ बढ़ी भी और कुछ घटी भी हैं,
उड़ाते थे जो मजहबी पतंगें, उनकी डोरियाँ अभी कटी सी हैं। 

रूबरू हुये खुद से और जाना तन्हाई भी एक खुशनुमा तराना है,
जाना हम में भी हैं कुछ छिपे हुनर और हमारा भी एक फ़साना है।

कल कोई और दौर था आज न जाने क्यों बदला हुआ सा ये ज़माना है,
अंजाम कैसा होगा कल का ये तो हौवा के बच्चों को ही आज़माना है।  

****
- अतुल श्रीवास्तव 

मुशाहिदा: observation, closely watch
रेहलत: Exodus, Departures
हौवा: In Islam आदम is believed to have been the first human on Earth. हौवा  was his wife - "mother of mankind". Similar to Manu and Satarupa in Hinduism. Satarupa is regarded as the first woman to be created by Brahma along with Manu. 

मंगलवार, फ़रवरी 11, 2020

मुल्क

धर्मांध भक्ति का भूसा भरा हो दिमाग में,
तो एक चिंगारी ही काफी है सारा जहाँ जलाने को।

हम तो कभी गलत हो ही नहीं सकते,
ऐसी गलतफहमी ही काफी है दूसरों को गलत बताने को।

आईने में कभी खुद को देखने की ज़ुर्रत न की,
पर कतराते नहीं दूसरों की बदसूरतियाँ गिनाने को।

दिल-और-दिमागों में दूसरों का बेतुका खौफ बिठा दो,
ये कारनामा ही बहुत है ज़मीं पर कयामत ढाने को।

हमसे रज़ामंद हो और सिर्फ हमारे ही साथ चलो,
काफी है ये नारा दूसरों पर गद्दारी की मोहर लगाने को।

झूठ की कहानियाँ बुनो और उसको ही सच बतलाओ,
और क्या चाहिये खून और आँसुओं की दरिया बहाने को।

मुल्क की तारीख अपने हिसाब से लिख डालो,
यही एक तरीका बचा है देश को महान कहलाने को।

तुम काफ़िर, तुम गद्दार और तुम हो दहशतगर्द,
बस यही संबोधन बचे हैं एक दूसरे को बुलाने को।

डर, मजहब और नफरत की लाठी लो, और चलाओ,
सबसे बेहतरीन तरीका है ये मूर्खों पर राज तख्त बिछाने को।

***
- अतुल श्रीवास्तव

रविवार, दिसंबर 29, 2019

वाणी

जब कोलाहल करे व्यथित मन,
चक्षु माँगे कुछ नींद के पल,
वाणी तुम्हारी सरस, आ जाये
बन वृष्टि का जल, नित्य चंचल। 


तुमुल विषाद जब करे गर्जना,
शिथिल पड़ने लगे चेतना,
राग तुम्हारी मरु पर यूँ छाये,
मूर्छित धरा स्वयं शाद्वल बन जाये।


तिमिर-विरह डसने को व्याकुल,
झुलसाती मन बन कर बाहुल,
मलय बन जाये तब तेरा गान,
कभी भक्ति-ज्ञान, कभी मदिरा का पान।


चिर एकांत एक प्राचीर बना दे,
नीरवता को अभेद्य करा दे,
तब बोल तुम्हारे मन को भाये,
आशा की लता स्वयम उपजित हो जाये।


चंचल पुलकित मन जब झूम के गाये,
स्वर-लिप्त तुम्हारे बोलों का सानिध्य ये पाये,
आभार अतुलनीय, शब्दों के परे,
हृदय करबद्ध मात्र वंदन ही करे॥


****
- अतुल श्रीवास्तव 

तुमुल: प्रचंड
शाद्वल: मरु उद्यान
बाहुल: अग्नि
तिमिर: अंधकार
चिर: लम्बी, दीर्घकालीन
प्राचीर: चारदीवारी
सानिध्य: निकटता

बुधवार, अगस्त 07, 2019

सखि यदि वो तुमसे कहने आते

सिद्धार्थ गौतम ने मानवीय पीड़ा से पीड़ित हो कर एक रात्रि को राजमहल, पिता शुद्दोधन, माँ माया, पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल का परित्याग कर के वन की ओर प्रस्थान किया मानवीय पीड़ा के मूल और उन्न्मूलन के विषय में ज्ञान प्राप्ति के लिये। जब यशोधरा को ये विदित हुआ कि गौतम बिना कुछ कहे और बिना किसी को सूचित किये सबका त्याग कर के चले गये हैं, तो उसने अपनी सखी से उलाहना की कि "सखि वे कह कर जाते"। यशोधरा के इन उद्गारों को श्री मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचना "सखि वे मुझसे कह कर जाते " में प्रस्तुत किया है। "सखि वे मुझसे कह कर जाते" http://kavitakosh.org/ पर (अवश्य) पढ़ें।  

यशोधरा के इस अभियोग के प्रत्युत्तर में उस सखि ने क्या कहा होगा? इसको मैंने अपनी इस कविता "सखि यदि वो तुमसे कहने आते" में व्यक्त करने का प्रयास किया है:

*सखि यदि वो तुमसे कहने आते*

मात्र मानव थे कोई बुद्ध तो नहीं,
अश्रुपात का वार क्या ह्रदय पर सह पाते?
हे सखि, यदि वो तुमसे कुछ कहने आते।


अधरों का चुंबन, यौवन का सम्मोहन,
इस रूप का आमंत्रण ठुकरा, क्या पलट कर जा पाते?
हे यशोधरा, यदि वो तुमसे एक पल को मिलने आते।


शिशु राहुल का निरीह क्रंदन, गोदी को आतुर हाथों का कंपन,
पितृ हृदय को विचलित कर जाते, वो मुँह मोड़ न पाते।
सखि यदि वो तुमसे कहने आते, स्वयम को पुनः असहाय ही पाते।


यदि वो कहने आते, व्यक्त किये उन्माद क्या उनके मन को भाते?
दशा तुम्हारी देख वस्तुतः स्वयम के निर्णय पर पछताते।
संशय के नीरद छा जाते, यदि वो कुछ कहने को आते।


रण में जाने की अनुमति दे देती हो, पर रण और इसमें अंतर है,
रण का निश्चित परिणाम पुनः आगमन की एक आस हैं लाते।
अब न लौटूँगा, क्या ये शब्द तुम्हारे मन को भाते? 


यशोधरा, सत्य कहो, स्वार्थ ग्रसित हृदय क्या समर्पण भाव को लाते,
या विच्छेद भाव के भय से मात्र विरह गीत ही गाते?
आसक्ति तुम्हारी क्या गौतम को मोह जाल में न उलझाते?


संताप तुम्हें कि प्रस्थान पूर्व गौतम ने क्यों पीड़ा न कही, 
पीड़ा का कारण उपेक्षा नहीं, अपेक्षा जो हम तुम में बसी।
हे सखि, यदि वो कह कर भी जाते, अपेक्षा तदापि शोक भाव ही लाते।


कटु सत्य प्रिये यदि बोलूँ मैं, नाम-मात्र सिद्धार्थ ही रह जाते,
सिद्धार्थ* कदापि न कर पाते, यदि वो तुमसे मिलने आते,
मात्र गौतम ही रह जाते, गौतम बुद्ध न वो बन पाते।


*****
- अतुल श्रीवास्तव 

* सिद्धार्थ: सिद्ध (Prove. Can be used for Achieve/ Accomplish) + अर्थ (meaning. Can be used for goal) - One who achieves his goal.

मंगलवार, जून 18, 2019

उलाहना

क्यों मूक खड़े हो एक द्रुम समान।
विचलित न करें घृणा, द्वेष, हिंसा, मैं हूँ हैरान।
बुद्धि है पाई पर क्यों है प्रस्तर सा ज्ञान?
धरा ही रहने दो, बना न इसको नर्क समान।


आध्यात्म की बातें सुनते और कहते हो,
और घृणा का कुटिल वार भी करते हो।
क्या विवषता कि विविधिता नहीं सह सकते हो?
क्या यही धर्म कि मारते और स्वयम भी मरते हो?


व्यर्थ न करो अपने पुष्पों का अर्पण,
कर अविरत स‌ंक्षोम पल पल प्रति क्षण।
बहुत हो गई यज्ञ, अर्चना अब तो देखो भीतर का दर्पण,
क्या मानवता नहीं योग्य सम्पूर्ण समर्पण? 


धामों का भ्रमण तो कर आया,
क्यों क्रोध न वश में कर पाया?
भजन, वंदना तो अविरत गाया,
त्याग न सका छल की छाया, धन की माया।


निराधार नर संहार वसुधा पर क्यों होता है?
वो अंतर्यामी क्या बस सोता है?
क्यों न अपनी ही रचना पर रोता है?
क्यों हो गया अदृश्य या मूक प्रस्तर समान?

विचलित न करें घृणा, द्वेष, हिंसा, मैं हूँ हैरान।

- अतुल श्रीवास्तव

गुरुवार, अप्रैल 11, 2019

अस्थिर चित्त

उधर क्या देखते हो इधर मैं हूँ बैठी।
ये भ्रम है तुम्हें कि हूँ मैं तुमसे रूठी।
इधर मैं हूँ जीवन, सखियों का सहारा,
उधर ध्यान क्यों है, वहाँ कौन है तुम्हारा? 


पंछी का कलरव, दिनकर की लालिमा,
शशि की चंद्रिका और ग्रंथों की गरिमा।
विषादों को ढकने खिली हर्ष की लता है,
उधर क्या मिलेगा ये किसको पता है। 


इधर ही मिलेगा सुख दुख में आलिंगन,
अधर पर, कपोल और मस्तक पर चुम्बन।
उधर की मृगतृष्णा हेतु चिंतित क्यों रहना,
गंगा यहीं है और निर्मल आनंद का झरना।


दृष्टा निहित है तुम में इधर ही,
इधर न विदित हो तो उधर भी नहीं।
जो देते हैं भय, लोभ तुमको उधर की,
यदि न खोजा इधर तो क्या पायेंगे उधर भी? 


इधर ध्यान दो, मैं हूँ इधर ही,
सूर्यास्त उपरांत इधर है सहर भी।
स्थिर मन से खोजो, सब कुछ यहीं है,
क्यों भ्रमित हो, उधर कुछ भी नहीं है।


उधर क्या देखते हो इधर मैं हूँ बैठी।
ये भ्रम है तुम्हें कि हूँ मैं तुमसे रूठी। 


- अतुल श्रीवास्तव

शुक्रवार, जनवरी 04, 2019

वैतरणी

क्यों वैतरणी के पार की सोचूँ, क्यों उस लोक का द्वार मैं खोजूँ?
मुझे अभी धरा पर रहना है, मनुष्य तो हूँ पर मानव बनना है।

परलोक भी है क्या कोई कहीं, मिथ्या तो नहीं, कोई छल तो नहीं?
स्थिर क्यों बैठूँ एक कुंड समान, मुझे एक सरिता बन कर बहना है।

क्या सुनी सुनाई को मैं मानूँ, या इस जग के अचरज को पहचानूँ?
एक पंछी बन विचरण करना है, अपनी गाथायें कहना है।

उस जीवन पर क्यों चिंतित रहूँ, क्यों इस जीवन में भ्रमित रहूँ?
बादल हो पर्वत पर जाना है, हिम बन कर शिखर पर गिरना है।

यज्ञ हवन से क्या कुछ होता है, होता तो हर प्राणी क्यों रोता है?
अभी तो सब वर्णों को अपनाना है, एक इंद्रधनुष बन जाना है।

क्या स्वर्ग सजा ऊपर है कहीं, दिखता न वो तुझको क्यों न यहीं?
इस स्वर्ग में एक झरना बनना है, मुझको घाटी में निर्झर झरना है। 

क्यों वैतरणी के पार की सोचूँ, क्यों उस लोक का द्वार मैं खोजूँ?
धरणी के विस्तृत सौंदर्य में अभी भटक भटक स्व को पाना है।


- अतुल श्रीवास्तव

बुधवार, जनवरी 02, 2019

निवेदन

इतराती पवन, न बन तू इतनी बावली,
मंडराते श्यामल मेघों को तनिक थम जाने तो दे।

कर आलिंगन बन जा तू भी थोड़ी साँवली,
इन देवों को गरज कर अमृत बरसाने तो दे॥

शाँत हो, यूँ क्यों हो रही तू उतावली,
नभ से अम्बुद का मकरंद थोड़ा निचुड़ जाने तो दे।

जल को तरसे नर, नारी, हर नगरी की बाओली,
थम जा, क्षुधा थोड़ी सी धरा की बुझ जाने तो दे।

भगाना नहीं, उड़ाना नहीं, इन श्याम देवों को तो है तुझे बहलाना,
फिर सरिता की तरंगों पर उमंगों की पतवार ले स्वच्छंद लहराना।

गिरती जलद मोतियों को अपने आँचल से इधर उधर बिखराना,
हो जाये वसुधा जब भूरी से हरी, तब फिर पंख लगा सबको सहलाना।

इतराती पवन, न बन तू इतनी बावली,
उठते हाथों पर कुछ एक बूँद जल की गिर जाने तो दे।।


- अतुल श्रीवास्तव

शुक्रवार, दिसंबर 28, 2018

असमंजस

शब्द निःशब्द क्या अंतर जब दोनों कष्ट ही दें।
शब्द निःशब्द क्या अंतर जब दोनों भ्रम नष्ट न करें। 


कब जोड़ें, कब तोड़ें, शब्दों का जाल ये सारा,
मूक बने कभी शूल, कभी बन जाये अमृत की धारा।


अर्थ हो अनर्थ शब्दों के कहने के ढंग से,
और कभी छिड़ जाये होली लहुओं के रंग से।


निःशब्द बने सहमति कभी शब्दों के विष की ,
और कभी मौन धरना की ढाल बने हर कोशिश की।


शब्द निःशब्द क्या अंतर जब दोनों कहर ही ढायें,
शब्द निःशब्द क्या अंतर जब दोनों सहर न लायें।


- अतुल श्रीवास्तव

बुधवार, अगस्त 22, 2018

घूसखोर

परेशान था, विचलित था, मेरा काम नहीं हो रहा था।
हर जानने वाला मुझसे बस यही कह रहा था,

चपरासी को पटाओ, बाबू को खिलाओ,
अपना दुख दूर करो और खुशियाँ मनाओ।

मैंने भी कहा, कुछ भी हो घूस नहीं खिलाऊँगा,
सच्चाई के ही बल पर अपना काम करवाऊँगा।

विचलित मन से शाँति के लिये एक मंदिर में जा बैठा,
पुजारी ने मुझे और मेरे परेशानी के हाव भावों को बहुत प्यार से देखा।

पास आया और बोला - वत्स चिंता न करो, ईश्वर तुम्हारा भला करेंगे,
एक बार पुनः तुम्हारे आँगन में खुशियों के फूल खिलेंगे।

बस ईश्वर के समक्ष चार किलो लड्डू का भोग लगाओ,
दो दर्जन केलों और सेब संतरों का प्रसाद चढ़ाओ।

मुझको भी 2001 रुपये चाँदी की तश्तरी में भेंट करो,
और भीमकाय दान पेटिका को स्वर्ण, रजत और नोटों से भरो।

फिर मैं इस मंदिर के आहाते में एक ऐसा पाठ लगवाऊँगा,
कि ईश्वर से ही तुम्हारे दुख दर्दों को धुलवाऊँगा।

बस अपनी भावनाओं को मैं कर नहीं पाया काबू,
और हाथ जोड़ जोर से चिल्लाया जय हो चपरासी,जय हो बाबू।

*****
- अतुल श्रीवास्तव

शनिवार, अगस्त 18, 2018

नीर

क्यूँ न करे तू तोय का आदर,
जल जायेगा, सूख गयी जो जल की चादर।
वैतरणी अब पार करेगा कैसे,
तरंगिणी बना दी एक विष की धारा।
बिन पय, अंजलि कैसे हो अर्पण,
ये जग क्या,  तू वो जग भी हारा।
चुल्लू में न अब तो पानी भरो,
आँखों का पानी न सूखने दो,
वारि पर पातक वार न हो,
अब कुछ तो करो, और कुछ तो कहो।
मेघपुष्प जब बुझ जायेगा,
निर्झरिणी सलिल न बह पायेगा,
पंछी का कलरव तब क्या गायेगा?
ये गौरैय्या भी माँगे अम्बु, उदक,
ताकि नाच सके ये उछल उछल और फुदक फुदक।


- अतुल श्रीवास्तव

शनिवार, जून 16, 2018

गौरैय्या

मन गौरैय्या भागे डाली डाली फुदक फुदक के,
सपनों के दाने चुगता कभी लपक लपक कभी रुक रुक के। 

लघु काया पंख भी छोटे, पर उड़ने की आशा नभ विशाल,
कभी पर्वत, कभी घाटी, कभी मरु के विस्तार में हूँ निहाल।

पंख उड़ा ले जाते उस जग, जा न पाऊँ जहाँ मैं उछल उछल,
सूरज का उगना, सागर में गिरना, झरनों की बूंदें, सरिता का कलरव,
मन  पुलकित हो जाये बहक बहक और मचल मचल।

साधारण कोई विशेष नहीं, इसीलिये पिंजड़े में न डाला कर के छल,
गौरैय्या मैं मंडराती रहती इधर उधर, हर क्षण, हर पल।

ओ मानव दानव तो न बन, मुझ गौरैय्या को भी तो रहना है,
झरनों को निर्झर बहने दे, घाटी में ओस बिखरने दे, नदिया है - उसको भी बहना है।

बन मेरे संग तू एक गौरैय्या, किसलय के पंख लगा,
वृक्षों की बाहों पर चढ़ कर भीतर के स्व व स्वर को जगा,
विदित तभी होगा तुझको क्यों गौरैय्या नाचे उछल उछल,
फुदक फुदक और मचल मचल, हर क्षण और हर पुलकित पल।  



- अतुल श्रीवास्तव

मंगलवार, मार्च 22, 2016

धर्म

धर्म, धर्मांध - युद्ध, रक्तपात,
यत्र, तत्र, सर्वत्र - हिंसा का ताप ।
घृणा का विष, अज्ञानता का आधार,
भय की आधारशिला, तर्क निराधार ।
दैविक प्रलोभन, धर्मोचित नरसंहार,
कुप्रथा, प्रणाली, मानवता पर प्रहार ।
मरीचिका की पराकाष्ठा, ठगी अपरम्पार,
कोटि भ्रम जाल, मिथ्या का अंधकार ।
युद्ध, अज्ञानता, हिंसा, घृणा, रक्तपात,
धर्म, धर्मांध - असहनीय ये आघात ॥
 

- अतुल श्रीवास्तव

शनिवार, नवंबर 14, 2015

शीतल बयार

इतराती हवा में एक चुभन तैरने लगी है,
कोहरे की परतें भी लालिमा छुपाने लगी हैं,
आँगन में जाना और गालों पर गीला सा चुम्बन,
भोर का आलिंगन और बदन में एक कम्पन,
पहाड़ों को ढकने लगी पशमीनों की परतें,
पेड़ों से झड़ने लगे लाल पीले ये पत्ते,
सूरज का सहलाना अब मन को भाने लगा है,
संग कम्बल में दुबकने को मन ललचाने लगा है।

- अतुल श्रीवास्तव (सियरा में मौसम का पहला हिमपात)

सोमवार, नवंबर 04, 2013

मानव

कभी मैं उसके आँगन में लहराता था,
धूप लू में बाहें फैला, छाँव के आँचल से कुटिया को सहलाता था।
अब उन्हीं गगन चूमती कुटियों की छाँव में पलता हूँ,
कब पड़ेगा वार आरियों का, यही सोच कर डरता हूँ॥
- मैं हूँ पेड़। 

लहरा लहरा आँचल से अपने उसके मैले तन को धोती थी,
प्यार भरे इस आँचल में उसके गंदे कर्मों को ढोती थी।
अब नम आँखों से उसी से मैं कर बद्ध निवेदन करती हूँ,
साफ करो अब तुम तन मेरा बस इसी आस से बहती हूँ॥
- मैं हूँ गंगा।

अपनी जटाओं से भेद कर बादल मैं उसकी प्यास बुझाता था,
अपनी गोदी में फल फूल लिये उसके मन को बहलाता था।
मेरे ही कंधे पर चढ़ कर वो काट रहा मेरा तन मन,
अब भेद न पाऊँ वो बादल जो विचरण करते उच्च गगन॥
- मैं हूँ पर्वत

लम्बे हाथों को फैला कर उन सब की रक्षा करता था,
मानव के तीर कमानों की वर्षा से बचा कर रखता था।
मेरे ही हाथों को काट काट वो मुझको कुचले जाता है,
मेरे परिवार के लोगों को मार मार अपना भवन सजाता है॥
- मैं हूँ जंगल/ हम हैं पशु पक्षी
 

- अतुल श्रीवास्तव

सोमवार, अक्टूबर 21, 2013

पुनरागमन

शीतल पड़ते सम्पर्कों से विचलित था, कुछ क्रोधित भी था,
सिमटते दिवसों की शिथिलता से अंतर्मन क्षोभित भी था।
प्रणय गीतों को रचने वाली विलुप्त हो रही वो भाषा थी,
ह्रदय तल में पनप रही परिवर्तन की आशा थी, उन्मुक्त होने की अभिलाषा थी।


परिवर्तन की आशा ने चहचहाती संध्या का आव्हान किया,
तुम धीरे से निकल गयी, न शोक हुआ, न विरह गीत का गान किया।
हर्ष हुआ, उल्हास हुआ, अपनों के संग आहाते में बैठ हास हुआ परिहास हुआ,
परिवर्तित इन कालों में भ्रमण, विचरण और रवि-किरणों से स्नान हुआ। 

हुआ समय व्यतीत, असहनीय हो चुभने लगा परिवर्तन का बढ़ता ताप,
सम्भवतः तुम्हारा गमन वितरित कर गया क्षणिक परिवर्तन पर एक मूक श्राप।
अनुभूति हुई तुम्हारे स्पर्श की आज उषा काल की बेला में ,
तुमसे मिलने की एक आस जगी, मैं लतपथ हूँ इस मेला में।

शीत लहरी की लघु पेंगो पर तुम आती हो, फिर जाती हो,
आगमन का मन है इसका निश्चय क्यों न कर पाती हो?
विडम्बना है और ये विदित है तुमको कि जब फिर से तुम आओगी,
मुझको एक बार पुनः तुम अपने से दूर भागता ही पाओगी।

छूने का प्रयत्न करोगी, तो मैं छुप जाऊँगा परतों में कपड़ों की,
दूर दूर भागूँगा और बना लूँगा कुटिया कम्बल के टुकड़ों की।
तिस पर भी आधीरता से है तुम्हारे पुनरागमन की अभिलाषा,
क्यों कि ह्रदय तल में फिर से पनप रही है परिवर्तन की आशा।

ओ शीत ऋतु तुम ठुमक ठुमक चपल गति से आ जाओ,
कुछ माह सही, अब आकर के कुछ कोहरे के बादल बिखरा जाओ।
 

- अतुल श्रीवास्तव

मंगलवार, सितंबर 25, 2012

मानसून

कब तक सहोगे ये शुष्क सा जीवन,
क्षीण करो ये ताप का बन्धन।
धो डालो ये ताप-वेदना, अब बूँदो को बहने दो,
नूतन आशा देंगी,इन बूँदो को निर्झर झरने दो।


बूँदो का विचलित प्रवाह ताप हरेगा,
काले मंडराते मेघों का कुछ ह्रास करेगा।
धुँधले पड़ते शीशों को धो डालो, अब बूँदो को गिरने दो,
खुशियों का आव्हान करो,न इन बूँदो को थमने दो।


बूँदों की सलिल-सरिता मरुभूमि में अंकुर जन्मेगी,
सतहों के भीतर दबे हुये बीजों को जब ये सींचेगी।
बीते काल के आघातों को बहने दो,न इन बूँदों को जमने दो,
आस जगेगी, बहने दो - इन आसुओं को सब कहने दो॥


- अतुल श्रीवास्तव

सोमवार, अगस्त 20, 2012

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मंदिर में मिल गये कल हमका सजे धजे से किशन कनहैय्या,
पास आकर धीमे से बोले बात करन क है तुमसे भैय्या।

तनिक बतावा हमका बबुआ काहे हमका सब जन भूले,
इक काम करा दो हमरा तो तोहरी भी सम्पत्ति क्षण क्षण फूले।

डाल के फोटुआ फेसबुक पर कहो कि सब जन करें शेयर,
अब यही तरीके भक्त बढ़ेंगे और यही तरीका लगे फेयर।

पर सुनो ओ बचवा ई ससुरे हैं लालच घूस के सारे मारे,
हाथ फैलाये खड़े मिले हैं हर मंदिर मंदिर द्वारे द्वारे।

कह दो सबका शेयर करें भला हुई है सम्पत्ति बढ़ेगी,
फिर देखो भक्तन की कैसी और शेयर करन की झड़ी लगेगी।

काम बने ना जब लालचवा से तब भय का ही उपयोग करो,
भय सबसे बलवान शस्त्र है हाथन में लेने से न तनिक डरो।

धमका देओ सब ससुरन का कि प्रभु हो जईहैं आग बबूला,
शेयर करो नहीं तो बन जईहो अंधा, लंगड़ा और इक हाथ से लूला।

- अतुल श्रीवास्तव

मंगलवार, अप्रैल 26, 2011

कटु सत्य

श्री अवधूत जी उन गिने चुने प्राणियों में से हैं जिन्हें ऊपर वाले ने गलती से भारत भूमि पर टपका दिया है। अवधूत जी अधिकतर भारतीयों से थोड़ा भिन्न हैं - ये अनाचार, दुराचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचार और सेहत के लिये हानिकारक सभी तरहों के अचारों से कोसों दूर ही रहते हैं। इमानदारी की हद तो ये कि रोज ही लेने के देने पड़ जाते हैं। अवधूत जी एक सच्चे देश भक्त और देश प्रेमी हैं - अपनी मातृ भूमि के लिये कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं। पर बेचारे कुछ कर नहीं पाते हैं तो अपने टीवी के सामने बैठ कर "इंडिया" में कोढ़ की तरह फैले हुये भ्रष्टाचार के बारे में देखते और सुनते हुये अपनी आँखो से तीन चार खारे पानी की बूँदे गिरा देते हैं। अब तो ये अवधूत जी की दैनिक दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बन गया है।

लोग कहते हैं कि भगवान के घर देर है पर अंधेर नहीं। इतने सालों के बाद भगवान को भी अपनी गलती पर ग्लानि हुई कि ऐसी नेक आत्मा को भारत में क्यों ढकेल दिया। प्रभु ने सोचा कि अवधूत जी के लिये कुछ करना चाहिये - बस आव देखा न ताव और आधी रात को अवधूत जी के कुटिया समान घर में अवतरित हो गये। लोग ये भी कहते हैं कि इमानदार आदमी बहुत चैन की नींद सोता है। प्रभु ने चैन की नींद सोते हुये अवधूत जी को झिझोंड़ झिझोंड़ कर बिस्तर से उठा डाला और बोले - वत्स, मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया। उसी त्रुटि का प्रायश्चित करने के लिये मैं तुम्हें दो वरदान दान में देता हूँ। तुम कुछ भी माँग लो।

अब अवधूत जैसा एक सच्चा देश भक्त भला क्या माँगता - झट से बोल दिया, "हे प्रभु! आप मेरी भारत भूमि से सर्वदा के लिये भ्रष्टाचार गायब कर दो।" ये सुन कर प्रभु चिंतित हो गये और बोले, "मैं स्वयं भगवान हूँ और मुझे ये कहते हुये शोभा नहीं देता कि ये कार्य तो स्वयं भगवान के लिये भी दुष्कर है। परंतु मैं अपनी ओर से भरसक प्रयत्न करूँगा। वत्स ये कार्य करने में थोड़ा समय लगेगा - अभी रात्रि हो गयी है, तुम वापस सो जाओ। सम्भवतः जब तुम कल प्रातः काल उठोगे तो तुम्हारी इक्षा पूर्ति हो चुकी होगी।"

प्रभु के इस आश्वासन के बाद अवधूत अब और चैन की नींद सो गया। अगले दिन जब अवधूत जी सो कर उठे तो बड़ा ही विचित्र नज़ारा था। सारा मोहल्ला, गली, शहर सून सान पड़ा था - सारे नर नारी गायब। पूरे शहर में सिर्फ गाय, गधे, कुत्ते, बिल्ली, सुअर और पशु पक्षी बचे थे। बीच बीच में शिशुओं की रोने की अवाज़ भी सुनाई पड़ रही थी। पर अवधूत जी के पड़ोसी, साथी कर्मचारी, घनिष्ठ मित्र, भाई, सगे सम्बन्धी और रिश्तेदार - सभी गायब - उड़न छू। अवधूत से ये सब सहन न हुआ और उसके ह्र्दय से एक मार्मिक चीत्कार गूँज उठी - हे प्रभु!

लोगों से ऐसा भी सुना है कि अपने भक्तों की करुण पुकार पर प्रभु भागे दौड़े चले आते हैं। कम से कम इस बार तो आ ही गये - वत्स क्या समस्या है? ऐसी गुहार क्यों?

अवधूत ने अष्रुपात करते हुये कहा, "प्रभु! ये कैसी मसखरी? मेरे समस्त पड़ोसी, साथी कर्मचारी, घनिष्ठ मित्र, भाई, सगे सम्बन्धी और रिश्तेदार कहाँ गायब हो गये?"

"वत्स तुम्हीं ने तो वरदान माँगा था कि भारत भूमि से सर्वदा के लिये भ्रष्टाचार गायब कर दो। मैंने वही तो किया।"

"पर प्रभु मैं अपने पड़ोसियों, साथी कर्मचारियों, घनिष्ठ मित्रों, भाई, सगे सम्बन्धियों और रिश्तेदारों के बिना नहीं रह सकता हूँ। मुझे वो सब चाहिये।"

प्रभु ने कहा "तथास्तु", और भारत भूमि पर भ्रष्टाचार वापस आ गया।

- अतुल श्रीवास्तव

शुक्रवार, नवंबर 12, 2010

महानायक - चन्द्रगुप्त मौर्य।

ईश्वर की कृति वो कृती भी था, 
उड़ते अलि का वो आली भी था, 
अश्म का अश्व नहीं, 
वो अनल भी था और अनिल भी था, 
वो समर्थ भी था, उसमें सामर्थ्य भी था, 
तृप्त तो था पर तप्त भी था, 
वो चक्रवाक एक चक्रवात भी था, 
कटिबंध बाँधे सदा कटिबद्ध भी था, 
वो नेकु नेक था, वो पुरुष तनिक परुष भी था, 
अपकार के बदले उपकार ही करता, 
अपचार नहीं बस उपचार ही करता, 
परिणाम के परिमाण को परे हटा, 
नित दिन दीन की सेवा करता , 
मात्र मातृ की वो सुधी सुधि करता, 
कर्म के क्रम में बंधा हुआ, 
धरा की धारा में खड़ा हुआ, 
मद्य के मद से वो दूर हटा, 
ललित ललिता के प्रणय, परिणय को छोड़ चुका, 
वस्तु,वास्तु,बदन,वदन वसन,व्यसन से मोह तुड़ा, 
वो सूर नहीं एक शूर ही था, 
भुवन ही भवन ये उसका था, 
विशाल कूट ही कुट उसका था, 
ग्रह का वरदान गृह उसके था, 
वो एक उपेक्षा जिसकी अपेक्षा न थी, 
उसके वक्ष पर वृक्ष भाँति गिरी, 
चिर चीर समान क्लांति त्याग कर क्रांति करी, 
तरंग के तुरंग पर,तरणि के तरणी पर पेंग भरी, 
पाणि में पानी भर संकल्प किया, 
हय पर सवार हो हिय से शंखनाद किया, 
हर प्रकार से प्राकार का सर्वनाश किया, 
निर्जर समान उन्नति का निर्झर बना, 
इतिहास के सर्ग में स्वर्ग को वसुधा पर रचा, 
निर्माण किया,निर्वाण मिला, 
वो महानायक आमरण भारत का आभरण बना। 

***
- अतुल श्रीवास्तव

कृति=रचना 
कृती=निपुण 
अलि=भ्रमर 
आली=सखी 
अश्म=पत्थर 
अश्व=घोड़ा 
अनल=आग 
अनिल=वायु 
समर्थ=सक्षम 
सामर्थ्य=शक्ति 
तृप्त=संतुष्ट 
तप्त=गरम 
चक्रवाक=चकवा 
चक्रवात=बवंडर 
कटिबंध=कमरबंध 
कटिबद्ध=तैयार 
नेकु=तनिक 
नेक=अच्छा 
पुरुष=आदमी 
परुष=कठोर 
अपकार=बुरा करना 
उपकार=भला करना 
अपचार=अपराध 
उपचार=इलाज 
परिणाम=फल 
परिमाण=वजन 
दिन=दिवस 
दीन=दरिद्र 
मात्र=केवल 
मातृ=माता 
सुधी=बुद्धिमान 
सुधि=स्मरण 
कर्म=काम 
क्रम=सिलसिला 
धरा=पृथ्वी 
धारा=प्रवाह 
मद्य=मदिरा 
मद=मस्ती 
ललित=सुंदर 
ललिता=गोपी 
प्रणय=प्रेम 
परिणय=विवाह 
वस्तु=चीज 
वास्तु=मकान 
बदन=देह 
वदन=मुख 
वसन=वस्त्र 
व्यसन=नशा 
सूर=अंधा 
शूर=वीर 
भुवन=संसार 
भवन=घर 
कूट=पर्वत 
कुट=घर,किला 
ग्रह=सूर्य,चंद्र.. 
गृह=घर 
उपेक्षा=निरादर 
अपेक्षा=उम्मीद 
वक्ष=छाती 
वृक्ष=पेड़ 
चिर=पुराना 
चीर=वस्त्र 
क्लांति=थकावट 
क्रांति=विद्रोह 
तरंग=लहर 
तुरंग=घोड़ा 
तरणि=सूर्य 
तरणी=नौका 
पाणि=हाथ 
पानी=जल 
हय=घोड़ा 
हिय=हृदय 
प्रकार=तरह 
प्राकार=किला 
निर्जर=देवता 
निर्झर=झरना 
सर्ग=अध्याय 
स्वर्ग=एक लोक 
निर्माण=बनाना 
निर्वाण=मोक्ष 
आमरण=मृत्युपर्यंत 
आभरण=गहना

मंगलवार, नवंबर 09, 2010

खाली दिमाग.

मूर्तियाँ पत्थर की जगह मिट्टी की होती जो, 
आँख के गंगा जल से कभी पिघलती तो। 

टूटते तारे को देख कर मन्नत माँगी सोचा भला होगा, 
पर ये न सोचा कि उसके गिरने से किसी का घर जला होगा। 

मारता है, काटता है, मरता है, मज़हब के लिये सब करता है, 
धिक्कार है मज़हब पर जो उसी इंसान के लिये कभी न मरता है। 

शराबी और सन्यासी में कोई अंतर नहीं, खुश होने का ढोंग रचाते हैं, 
खुद को नशे में डुबो कर, जिम्मेदारियों और वास्तविकता से मुँह चुराते हैं। 

अगर गली गली नफरत की जगह अकल बंटती होती, 
तो शायद मंदिरों,मस्जिदों की जगह पुस्तकालयों की ज़रूरत होती। 

*****
- अतुल श्रीवास्तव 

मूर्तियाँ

बहुत दिनों से माननीय सुश्री भानुमती जी समाचार पत्रों और अदालतों की कुंद बुद्धि का शिकार बनी हुई हैं। और, कारण हैं किसी का नुकसान न पहुँचा सकने वाली पत्थर की मूर्तियाँ। ये सब गिरी हुई करतूत है मुये “सभ्य” लोगों की जो न इस महान कार्य की महत्वता को समझते हैं और न ही उन सच्चे भारतीयों के बारे में जानते हैं जिनकी मूर्तियाँ गली गली में खड़ी की जा रही हैं। सुश्री भानुमती जी के इस पावन और महान कार्य के महत्व से मैं आपको संक्षिप्त में अवगत कराता हूँ – अब आप इस बात से इंकार तो नहीं करेंगे कि आज कल बड़े शहरों में पढ़ रहे बच्चों का भारतीय चीजों का ज्ञान उत्तर प्रदेश के समस्त नेताओं के आई. क्यू. से भी कम है। नहीं सहमत हैं? कोई बात नहीं सेंट अल कपोन (जरूरी बात ये है कि बच्चे के स्कूल का नाम “सेंट” से शुरू होना चहिये और उसके बाद एक धाँसू सा अंग्रेजी नाम होना चाहिये) में पढ़ रहे पंद्रह वर्षीय भरत से पूछिये के पाणिनि कौन थे या वो गार्गी के बारे में क्या जानता है। बस इसी समस्या का समाधान है सुश्री भानुमती का ये पुण्य काम और विकीपीडिया का ज्ञान सागर। 

जरा सोचिये सुश्री भानुमती जी का ये काम कितना लाभदायक होगा बच्चों को भारत से अवगत कराने में। आप कान में हेडफोन ठूँसे हुये अपने किशोर या किशोरी के साथ गोल मर्केट जायेंगे और वो अपनी “बीच की उँगली” मूर्तियों के ओर उठा कर आपसे पूछेगा – “Dad who is that sick looking dude?”, “Who is that old lady?”, “And, who is that cool looking guy riding a horsie?” और, आप सीना फुला कर कहेंगे – “बेटा वो पाणिनि की स्टैचू है। ये गार्गी की और ये हैं महाराणा प्रताप जी।“ बच्चा मुंडी हिलायेगा - अगर आपकी किस्मत अच्छी हुई और बच्चे के दिमाग में जिज्ञासा नामक कीड़ा होगा तो शाम को फेसबुक पर “जोक्स” पढ़ते पढ़ते विकीपीडिया पर इन महान हस्तियों के बारे में भी पढ़ लेगा। मैं तो कहूँगा कि हमें हर दस पंद्रह फीट की दूरी पर मूर्तियाँ स्थापित कर देनी चाहिये। एक फायदा तो मैं ऊपर लिख ही चुका हूँ। और भी कई फायदे हैं – जैसे कि कबूतर और चिड़ियों को सुलभ शौचालय और पान खाने वालों को पीकदान मिल जायेंगे। 

खैर, मैंने सोचा कि सुश्री भानुमती जी को इस नेक काम के लिये धन्यवाद अवश्य देना चाहिये। बस पहुँच गया उनके निवास स्थल पर। गेट पर ही दरबान ने रोक लिया – 

“काहे के खातिर आये हो?”
 
"सुश्री भानुमती जी के चरणों में नत मस्तक करना है।" 

“बड़ी कड़क हिन्दी बोले हो भैय्या। खईर बहुत जन आवे हैं माथा टेकन भये। उह वाली लाईनवा मा लग जा।"

लाईन की ओर देखा तो पसीना चू पड़ा। तकरीबन तीन चार सौ लोग चिलचिलाती धूप में लाईन में डटे हुये थे। मैं पलट कर दरबान जी की ओर दौड़ा, “अरे दरबान साहिब मैं तो अम्मा जी को कुछ भेंट देने के लिये आया था।" 

“कैस (कैश) है या कौऊनो जमीन जायदाद है?” 

बात मेरी कुछ समझ में आई नहीं, इसलिये झट से बोल पड़ा, “कैश है कैश” 

"तब जईके दुसरी वाली लईनवा में लग जा।" 

ये क्या ये तो अर्थ का अनर्थ हो गया। भेंट वाली लाईन में तो हजार लोग खड़े हो कर पंखा झल रहे थे। उल्टे पाँव दौड़ पड़ा दरबान की ओर, “अरे दरबान भैय्या मैं तो अम्मा जी को मूर्ति के बारे में आईडिया देने आया हूँ।" 

“तो ऐसन कहा न। अरे जबसे इह स्रेनी(श्रेणी) वाली कतार बनाई है तुम पहले प्राणी हो जो यह खातिर यहाँ धमके हो। कौऊनो ससुरा उस लाईन माँ हईये नाही – तोहरी तो डिरेक्ट एंट्री है, चला जा सीधा मईया के दरबार मा।" 

बस मैं सीधा सुश्री भानुमती जी के सभा कक्ष में प्रवेश कर गया। मेरे ठीक सामने सुश्री भानुमती जी अपने भीमकाय शरीर से एक छोटे से सोफे को कुचल कर मारने का प्रयास कर रहीं थी। मैंने माथा टेका, भानुमती जी ने पूछा कि कैसे पधारे, और मैं पूछ पड़ा, “आप आज कल मूर्तियाँ बनवाने और स्थापित करने में लगी हुई हैं। इसके पीछे मूल कारण क्या है?” 

भानुमती जी ने बड़ी आत्मीयता से कहना प्रारंभ किया, “सिरीवास्तव जी, हमारे देस के बड़े बड़े महापुरुस लोग हमें बहुत सिखा कर गये हैं, उन्होंने हमारे जीवन का उद्धार किया, हमें सभ्य बनाया, हमें नयी नयी चीजों से अवगत कराया। हमें उनका सम्मान करना चाहिये – बस ऐसे ही महापुरुसों को याद रखने के लिये हम उनकी मूर्तियाँ स्थापित करते जा रहे हैं।" 

इधर भानुमती जी प्रवचन दिये जा रही थीं और दूसरी ओर मेरा द्रुतगामी दिमाग सोचे जा रहा था कि मैं भी एक ऐसी ही महान हस्ती को जानता हूँ जिसने हम असभ्य और गंवार भारतीयों को civilized बना डाला है – ऐसी ऐसी नये चीजें सिखाई हैं जिनके बारे में हमारे दादा और पर दादाओं को हवा तक नहीं थी। मैंने उसी क्षण निर्णय ले लियी कि मुझे भी इस महान हस्ती की मूर्ति बनवा कर न सिर्फ़ हज़रतगंज में वरन India के सारे बड़े और civilized शहरों में स्थापित करनी है। 

“भानुमती जी आप ये मूर्तियाँ किससे और कहाँ से बनवाती हैं? क्या आप उस जगह का पता देंगी?” 

हाँ हाँ कहते हुये सुश्री भानुमती जी ने जलेबी वाले लिफाफे के पीछे पता लिख कर मेरे हाथों में थमा दिया, और मैं एक विजयी सिपाही की तरह हाथों में पता और चेहरे पर एक चौड़ी सी मुस्कान लिये बाहर आ गया। अगले ही दिन मैं गजगामिनी और ठुमक ठुमक कर चलने वाली उ.प्र.रा.प.नि. (उत्तर प्रदेश राजकीय परिवहन निगम) की जनता बस में सवार हो गया – तहसील रानीगंज, जिला प्रतापगढ़ जाने के लिये – आखिर मूर्ति जो बनवानी थी। अब आपसे क्या छुपाऊँ 1975 से आज तक ये जनता बसें और रानीगंज जाने वाली सड़कें अविराम यही नारा लगाये जा रही हैं – बदलना हमारी फितरत में नहीं और हमको बदल दे ऐसा कोई जन्मा नहीं। बस चलने से पहले चारबाग बस स्टेशन पर काले पड़ रहे तेल में तले और तरे हुये छोले भटूरों का सेवन किया, बड़ी सी डकार ली और मुँह पानी से भर कर सड़क पर पिच्च से कुल्ला दे मारा। बस चली हिचकोले खाते हुये – सड़क भयंकर थी और समस्या उससे भी गंभीर। छोले भटूरों ने कहा हमें नहीं जाना ऐसी बस में, और ऊपर और नीचे से निकलने का जुगाड़ करने लगे। खैर साढ़े चार घंटो के बाद रोते पीटते सही सलामत मैं पहुँच गया तहसील रानीगंज, जिला प्रतापगढ़। छोटा सा ही कस्बा था इसलिये मूर्तिकार राम खिलावन का घर जल्दी ही और आसानी से मिल गया। 

“जय राम जी की राम भैय्या।“ 

"राम जी की जय बाबू। सकल और कपड़न से तो पढ़े लिखे बाबू लगत हो। हियाँ इस बदबूदार गाँव में कईसन आये गये?” 

"अरे अगर सरकारी अधिकारी, नेता या अभिनेता होता तो कुआँ खुद ही प्यासे के पास चला जाता। पर मैं तो साधारण सा आदमी हूँ इसी लिये ये प्यासा कुयें के पास आया है। आपसे एक मूर्ति बनवानी है।" 

"सही कहे हो बाबू। पढ़े लिखे लोग तो जरूरत पड़न पर भी गाँवन का रुख नाही करे हैं – चपरासी और नौकर जाति को हियाँ भेज देवे हैं मच्छरवन से कटवाई खातिर। पर बाबू काहे हो पैसा बरबाद करै पर तुले हो। मुर्तियाँ तो तबही अच्छीं जब मंदिर में बैठें – कम से कम लोग जना फल, फूल और रुपैय्या पैसा तो चढ़ाये हैं। गली नुक्कड़ पर लगी मूर्तियन पर तो कुकुर (कुत्ता) मूतें और चिड़ियाँ करें टट्टी – चाहे वो हो गाँधी बाबा या लाल बहादुर सासतरी।" 

मैंने राम खिलावन को भाषण पिला डाला, “उन सभी महापुरुषों या हस्तियों की मूर्ति स्थापना होनी ही चहिये जिन्होंने हमारा जीवन परिवर्तित किया है, सिखाया है और प्रगति के पथ पर ढकेला है...” 

"ठीक है ठीक है बाबू। आपको कौनो महापुरुस की मूर्ति बनवाये क है?” 

"अंकल सैम की। अमेरिका मतलब कि अमरीका की।" 

"अब ई अंकल सैम कौन हैं और का किहिन हैं हमरी खातिर?” 

“अरे राम खिलावन जी इन्हीं ने तो भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या तो ठीक और सभ्य तरीके से बोलना सिखाया है – गंवारों को सिविलाईज़्ड बनाया है। अब आप ही बताओ जब आप टी वी और “हिन्दी” फिल्मों में लोगों को टिपिर टिपिर अंग्रेजी बोलते देखते हो तो आपके नहीं लगता कि आप और आपका बेटा भी ऐसी ही फर्राटे से अंग्रेजी बोले। आप जब शहर जाते हो तो थोड़ी बहुत शरम तो आती ही होगी शहरी बाबुओं के बीच में?” 

"बात तो सही है तोहरी। इही खातिर हमहूँ अपने बिटवा को अंगरेजी इसकूल में डाले हैं। पर बाबू अंग्रेजी तो हमका अंग्रेज सिखाये हैं – ये सैम टैम कौऊन प्रानी हैं?” 

"आप भी न... भारत आजाद हुआ था 1947 में, पर अंग्रेज वो न कर पाये जो अंकल सैम ने पिछले 10-15 सालों में कर डाला। सिर्फ़ अंग्रेजी ही नहीं उन्होंने हमें और भी कई चीजों में शिक्षित किया है...” 

"जैसे कि...” 

"अच्छा आपको पता है कि नीला रंग लड़कों के लिये और गुलाबी रंग लड़कियों के लिये होता है...” 

"नहीं..." 

"मुझे और मेरे दादा को भी नहीं पता था। भला हो अंकल सैम का कि अब अधिकतर भारतीय न सिर्फ जानते हैं पर उसका पालन भी करते हैं।" 

"बाबू और क्या सिखाये हैं ई सैम बाबू हमका..” 

"अब आप देखो ये ससुरे दूरदर्शन वाले हम सबको सालों साल घिसे पिटे, बोर करने वाले, सीख देने वाले और नीरस कार्यक्रम दिखाते रहे – भारत एक खोज, चाण्क्य, श्रीकांत, मालगुडी डेज़... भला हो अंकल सैम का कि अब हमारे टी वी वालों को दिमाग पर जोर नहीं डालना पड़ता है, और फ़टाफ़ट मसाले दार और सेक्सी लड़कियों से भरपूर तरह तरह के उच्च स्तरीय टी वी प्रोग्राम हमारी सेवा में परोस देते हैं।" 

"और बताओ बाबू...” 

"हमारे होनहार बच्चों को जयपुर घराना या लखनऊ घराना पता हो या न हो पर सबको हिप हॉप और ब्रेक डांस जरूर पता है। वैसे खिलावन जी आज कल नृत्य को डांस कहते हैं। भातखंडे गया भात खाने, बच्चों को नयी अच्छे चीज़ सीखने को मिली है – रैप।" 

"पर रेप तो कनूनी अपराध है...” 

"आप चिंता न करें ये वाला सिर्फ गानों के साथ किया जाता है..। और अगर रैप अमरीकन घेटो (Ghetto) स्टाईल में न करें तो फिर फायदा क्या?” 

"हाँ बचुआ बताई क रही कि आज कल बड़ा बड़ा सहरों मा लोग कौऊनो नये तरीका का डांस किये हैं सब लोग – हियाँ तक क महरारू (औरत) जना भी...” 

"हमारी फिल्में भी देखो तो लगता है कि हॉलीवुड का हिन्दी रूपांतर चल रहा है। मुझे तो लगता है कि अगर हॉलीवुड ने फिल्में बनाना बंद कर दिया तो हमारे लोग पुरानी फिल्मों को तब तक रिसाईकल करते रहेंगे जब तक वो फट फटा कर चिथड़े चिथड़े नही हो जायेंगी। अब देहाती तरीके के गोद भराई के दिन भी गये। भला हो सैम जी का कि हम उजड्डों को Baby Shower और Bachelor Party का शऊर आ गया।" 

“अरे हम तो पूछना ही भूल गये। कुछ पीहैं (पियेंगे) आप? अरे बचऊ जरा साहिब के लिये एक ठो ठंढा पेप्सी और एक पैकटवा लेज़ चिपस का ले आ।" 

"अरे दिक्कत क्यों करते हो? हो सके तो छाछ पिलाओ।" 

"आप भी मजाक करते हो बाबू। अब ई सब देहाती चीज़ कौन पिये है? आप तो बस सैमवा के बारे में बताये जाओ।" 

"अब आप से क्या कहना। वैसे तो हमारे देश में सैकड़ों त्योहार हैं, पर सब के सब बहुत पुराने हो गये हैं और उनमें वो मौज मस्ती नहीं रही। तो सैम जी ने हम लोगों को नये नये और ज्यादा मजेदार त्योहारों से लैस कर दिया जैसे कि Friendship Day, Valentine Day, Christmas (more like a fashion trend for “cool” and Americanized people) और जल्दी ही हम लोगों को Thanksgiving Day और Halloween Day के बारे में भी सिखाया जायेगा।" 

“साहिब, भगवान भला करें इन सैम जी का। बड़ा पुन्न (पुण्य) का काज किये हैं ये, वरना हम तो ससुर गंवार के गंवार ही रह जाते।"

"अब देखो क्रिकेट जैसा खेल जो नीरस होने की कगार पर खड़ा था, उसका भी अमरीकी-करण तो करना ही था – आयातित गोरी बलायें चौका या छ्क्का लगने पर ठुमक ठुमक कर पुरुष जाति के दर्शकों का कैसे मनोरंजन करती हैं। अच्छा आप ये तो मानोगे कि सभी प्राणी महापुरुषों का आशिर्वाद पाने के लिये लालायित रहते हैं, और जब महापुरुष उनके सर पर हाथ रख देते हैं तो अपने आप को धन्य समझने लगते हैं और गर्व से कहते हैं कि फलाँ फलाँ महापुरुष ने स्वयं अपने हाथ से उनको प्रसाद या भभूति दी।"

"हाँ ये सोलहो आना सच्ची बात है।"

"बस सैम जी का भी कुछ कुछ ऐसा ही प्रभाव है। कोई कितना भी बड़ा कलाकार क्यों न हो, पर जब तक सैम अंकल अपने हाथ से भभूति न दे दें तब तक वो महान कहला ही नहीं सकता। या ये भी कहा जा सकता है कि अगर सैम अंकल किसी गधे पर भी भभूति छिड़क दें तो हम सब गर्व से फूल कर गधे को भी पूजने लगते हैं। हम कितने महान हैं या हमने कितनी तरक्की कर ली है इस पर हम तभी विश्वास करते हैं या उसे सच मान लेते हैं जब सैम जी हमें Newsweek, Times या The Economist के जरिये से बताते हैं।"

"बड़े परभावसाली हैं ये सैम चचा तो।"

"सो तो ये हैं ही, वरना हमें शालीन तरीके से गालियाँ बकना कौन सिखाता। जैसे कि शिट, फ# और आसहो@। आप टी वी देखो – लोग क्या धड़्ड़ले से शिट बोलते हैं।"

"ई शिट का बला होवे है?"

"अरे वही जो चिड़ियाँ मूर्तियों पर करती फिरती हैं और आप सुबह सुबह खेतों में करने जाते हो।"

"हा हा हा ई तो बड़ा मजेदार बात हुई। सोचो कोई हमसे पूछे कि भैंसवा का चारा दियो कि नाही और हम कहें – अरे पैखाना, भूल गया... हा हा हा।"

"कल ही मैने एक महानुभाव को टी वी पर एक टी-शर्ट पहने देखा जिसपे लिखा था “FCUK” – अब भाई गाली देने और दिखाने का शालीन तरीका तो हमने सैम अंकल से ही सीखा है न?” 

“और बतायें...”

“खिलावन भाई आपकी शादी कैसे हुयी थी...”

"अरे आप तो हमरी दुखती रग पर नमक रगड़ रहे हो। बापू और अम्मा हमार कनवा (कान) उमेंठ कर हमका सावितरिया (सावित्री) संग बियाह दिये रहें।"

“अरे आप समझे नहीं। खैर अब आजकल अगर आप को शादी करनी है तो एक घुटने पर बैठ कर, एक हाथ से हीरे की अंगूठी आगे करते हुये कहना होगा – Will you marry me? और, ये किसने सिखाया? अंकल सैम के हॉलीवुड ने। बॉलीवुड नाम की प्रेरणा किसने दी? अंकल सैम के हॉलीवुड ने।"

“हुजूर आप तो बड़ी गजब की बातें बताये रहे हो...” 

"खिलावन भाई आप ही बताओ हम महान हैं कि सैम चाचा? हम पिछले पचास सालों में दुनिया को कुछ न सिखा पाये, पर सैम जी ने हमको खाना, पीना, बोलना, नाचना, गाना और तो और उनकी तरह सोचना भी सिखा दिया और वो भी सिर्फ़ पिछले 10-15 सालों में। हैं न महापुरुष?”

"सही कह रहे हैं आप। मेरे बिचार से तो सैम जी की मुर्तिया तो कौऊनू गली नुक्कड़ मा नाही बलकी मंदिरवा मा लगाई क चाही।"

“तो फिर देर किस बात की है फटाफट बनाओ और स्थापित करो।"

"पर साहिब एक ठो पिराबलम है। यदि सैम जी की मूर्तिया बनाई के मंदिरवा मा लगाई गई तो हमरे देस बासियों को सुहायेगा नहीं। अरे बहुतै (बहुत ही) बड़ा हंगामा हुई जईहै।"

"सो तो है, पर क्या कहें अब ये भारतीय नास्तिक भी हो चले हैं। जिसको अपना रहे हैं, उसी को नकार भी रहे हैं। पर आप मायूस न हों – दिल से तो सब मानते हैं और एक न एक दिन सब एक स्वर में बोलेंगे भी जरूर कि सैम बाबा की जय हो..."

*****

- अतुल श्रीवास्तव 

रविवार, जनवरी 17, 2010

असमंजस

गरमी के ताप से सुलगती धरा की वेदना को देख कर सावन के माह ने पदार्पण करने का निश्चय ले ही लिया। धरती को अविराम अपनी उष्मा से सींचता हुआ सूर्य भी थक सा गया था अत: काले घने बादलों की चादर के पीछे मुँह छुपा कर कुछ क्षण के लिये सोने का प्रयत्न करने लगा। वायुगति से भागते हुये बादलों ने भी जब विश्राम के लिये रुक कर गर्मी से व्याकुल वसुन्धरा की स्तिथि देखी तो अपने अश्रुपात को रोक न सके। पानी की शीतल छीटों से अपने आप को भिगो भिगो कर समस्त प्राणी बाहें फैला कर सावन के आगमन का स्वागत करने लगे। 

जहाँ सारा देश प्रसन्नचित हो कर सावन के आने की खुशियाँ मनाने लगा, छोटे बच्चे पेड़ की डालों पर झूले डालने की तैय्यारियाँ करने लगे, वहीं सोनभदर नाम के एक छोटे से गाँव के लोगों में आने वाले संकट का भय फैलना प्रारंभ हो गया। भय इस लिये क्यों कि सोनभदर स्थित है कर्मनाशा नदी के तट पर। वही कुख्यात कर्मनाशा नदी जिसके बारे में ये किंवदंती प्रचलित है कि 'ई नदिया बाढ़ी, जिया लेके मानी'। गाँव के वृद्ध विचलित होने लगे कि यदि इस वर्ष वर्षा मूसलाधार हुई और ये जान-लेवा कर्मनाशा सर्प की भाँति रेंगती हुई गाँव में प्रवेश कर गयी तो बिना किसी की जान लिये वापस न जायेगी। अगर ऐसा हो गया तो कौन बलि के लिये आगे आयेगा? 

इस वर्ष इन्द्र के पास जल भंडार कुछ अधिक ही था – बिना कोई विराम लिये पानी बरसाये जा रहे थे। जैसे जैसे कर्मनाशा का जल स्तर ऊपर उठता वैसे वैसे सोनभदर के लोगों का भय और बल पकड़ता जाता। जहाँ एक ओर गाँव के निवासी अपनी आने वाले संकट के निवारण के बारे में सोच रहे थे, वहीं दूसरी ओर सोनभदर के थाने में तैनात एकमात्र थानेदार बिसम्भर सिंह बस यही सोचता रहता कि अपने पद के भय को और कैसे प्रयोग में लाया जाये। गाँव के निवासियों के संकट और पीड़ा से कोसों दूर रहने वाला बिसम्भर दिन भर थाने के बाहर स्टूल पर बैठ कर चिलम फूँकता और रात को ताड़ी पी कर गली चलते लोगों को परेशान करता। पर सोनभदर के लिये ये कोई नई व्यथा न थी। आजतक गाँव मे संरक्षक के रूप में आये हुये सभी थानेदारों की करतूतें ऐसी ही रही हैं। पर शायद अभी तक आये हुये सभी थानेदारों में बिसम्भर सबसे तुच्छ कोटि का प्राणी था – गाँजा लगाना, ताड़ी पीना और पैसे उमेंठना तो सभी थानेदारों ने किया, पर बिसम्भर की तरह गाँव की किशोरियों को ललचाई कुदृष्टि से किसी और ने न देखा था। पिछले कई सप्ताहों से बिसम्भर की कामयुक्त कुदृष्टि राम खिलावन की उन्नीस वर्षीय पुत्री बेला का पीछा किये जा रही है। 

वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही है और कर्मनाशा के तरंगे प्रसन्नता से उछलना शुरू हो गयी हैं कि शीघ्र ही सोनभदर से मानव बलि प्राप्त होगी। गलियों में भरते हुये पानी ने नित्य प्रतिदिन का जीवन अस्त व्यस्त कर दिया है – लोग बाहर कम निकल रहे हैं, घरों में ही कैद होकर बैठे हुये हैं। ऐसे में बिसम्भर के पास भी कुछ करने को नहीं है। बस बिसम्भर के खाली दिमाग को शैतानी विचारों ने अपना घर बना लिया है और उसके समक्ष सर्वदा बेला की छवि मंडराने लगी है। थाने के बाहर बैठ कर चिलम फूँकता हुआ बिसम्भर पानी के बढ़ाव को देख रहा था। आज कर्मनाशा का जल स्तर कुछ अधिक तीव्रता से ऊपर उठना शुरू हो गया है। और, उसी आवेग से बिसम्भर के कामुक विचारों ने भी पेंगे मारना प्रारम्भ कर दिया है। सहसा उसकी नजर गली में जाती हुई बेला पर पड़ गई। बिसम्भर ने दूर से ही चिल्ला कर पूछा, “अरी बेलवा इतनी बारिस और बीहड़ मौसम में काहे की खातिर घरे दुवारे से बाहर निकली हो?” 

बेला ने बिसम्भर की ओर बिना देखे ही चिल्ला कर जवाब दिया, “थानेदार जी तनि खेतवा की ओर जाई क है।“ ये कह कर बेला चल पड़ी खेत की ओर। और, थोड़ी ही देर के बाद बिसम्भर भी चल पड़ा बेला के खेत की ओर। बिसम्भर के पैर जितनी गति से खेत की ओर बढ़ रहे थे उससे अधिक गति से कर्मनाशा बढ़ रही थी सोनभदर की ओर। 

सोनभदर के लोगों को जिस बात का भय था अंततः वही हो गया – समस्त गाँव को कर्मनाशा ने डुबोना प्रारम्भ कर दिया। कर्मनाशा के प्रचंड को शांत करने का एक ही उपाय था – बलि। पर किसकी बलि? संध्या का समय था – गाँव के लोग चौपाल पर एकत्रित हो कर इस विचार विमर्श में लीन थे कि इस बार कर्मनाशा को भोग के लिये क्या परोसा जाये। उनके इस विचार विमर्श को भंग किया चौपाल में गिरती हुई मन और तन से विक्षत बेला ने। बस पल भर में निर्णय हो गया अपवित्र और कलंकिनी बेला को कर्मनाशा को सौंपने का। न जाने कहाँ से गली में सैकड़ों लोग आ गये – भीड़ चलने लगी कर्मनाशा की ओर सुतलियों से बंधी हुई बेला की भेंट चढ़ाने। रास्ते में ही राम खिलावन का झोपड़ा पड़ता था। शोर शराबा सुन कर बाहर आ गया। अपनी बेटी को ऐसी अवस्था में देख कर चीत्कार कर उठा। उसने गाँव वालों की कथा और अपनी बेटी की व्यथा सुनी – कुछ क्षण के लिये चुप रहा फिर अपने झोपड़े में चला गया। बाहर आया तो हाथ में कर्मनाशा की लहरों की तरह एक लम्बा सा गंडासा लहरा रहा था। 

भीड़ से उत्तेजित आवाज में रुकने को कहा और दौड़ पड़ा थाने की ओर। कुछ पल बाद ही घनघोर बारिश की गिरती हुई सतहों के बीच में से राम खिलावन की काया दिखनी शुरू हुई और उसके साथ साथ गली में घिसटती हुई आ रही थी रक्तमय जीवन रहित बिसम्भर की काया। राम खिलावन ने आगे बढ़ कर बेला को सुतलियों के बंधन से मुक्त कराया, अपने कंधे से लगाया और बिसम्भर की ओर संकेत करते हुये प्रबल वाणी में कहा – ई रहा तोहार पापी और कर्मनसवा का भोग। भीड़ ने बिसम्भर का शव उठाया और कर्मनाशा को बलि के रूप में सौंप दिया। परंतु आज कर्मनाशा असमंजस में पड़ गयी। ये कर्मनाशा की हार थी या जीत? यदि वो गाँव वालों की इस जीत को अपनी जीत मान कर उसमें सम्मलित होना चाह्ती है तो उसे गाँव में ही रहना होगा, और यदि वो गाँव छोड़ कर जाती है तो ये उसकी हार होगी अर्थात वो गाँव वालों की जीत को अपनी हार मानती है। 

*****
- अतुल श्रीवास्तव 

कमबख़्त जेबें.

ऐशबाग में रहने के कई फायदे हैं, पर जो सबसे बड़ा फायदा है वो ये है कि सुबह सुबह आँख खोलने के लिये कभी मुर्गे की बाँग या अलार्म घड़ी के टिन टिन की ज़रूरत नहीं पड़ती है। गली में सुबह छह बजे से जो हो-हल्ला और चिल्ल-पों शुरू होता है वो एक साधारण आदमी तो क्या, धतूरे के नशे में धुत्त कुम्भकरण की आँखों से नींद उसी तरह से उड़ा दे जैसे चुनाव जीतते ही नेता गण अपने क्षेत्र से गायब हो जाते हैं।

रोज़ की ही तरह आज भी गली में भौंकते कुत्तों ने और गली के नाई के रेडियो पर जोर जोर से बजते “मेरा सुन्दर सपना टूट गया...” गाने ने भारतीय जी की निद्रा को भंग कर दिया। आँख मसलते हुये भारतीय जी ने खटिया का परित्याग किया, पर आज भारतीय जी का मन कुछ खिन्न सा था। बस उसी खिन्न मन से भारतीय जी ने दातों पर दातून मसली, और कुर्ता पैंट डाल कर निकल पड़े सुबह की सैर के लिये – पर आज थोड़ा भुनभुनाते हुये कि किस गधे ने इस जगह का नाम ऐशबाग रख दिया – यहाँ न तो कोई बाग है और ऐसे शोर शराबे में भला कोई ऐश क्या करेगा।

भारतीय जी अभी एक-आधा फर्लांग ही चले होंगे कि अख़्तर मियाँ से टकरा गये। अब क्यों कि मोहल्ले में पानी की किल्लत रहती है इस लिये अख़्तर मियाँ ने पान की पिचकारी से ही गली को धोया और अपना रोज़ सुबह वाला सलाम भारतीय जी की ख़िदमत में ठोंक दिया। अख़्तर मियाँ की गली में ही छोटी सी एक दर्जी की दुकान है – अंजुमन लेडीज़ एंड जेंट्स टेलर्स। अख़्तर मियाँ हमारे भारतीय जी के सदियों से दर्जी रहे हैं; और अख़्तर मियाँ के अब्बू मुश्ताक़ ज़नाब सदियों तक भारतीय जी के पिता जी के कपड़े सिलते रहे – शायद ये संबन्ध और भी पीढ़ियों पुराना है। और, शायद इसी लिये दोनों में अगाढ़ प्रेम और अटूट दोस्ती है।


पर आज भारतीय जी चिडचिड़ाये हुये थे, और ऐसे में जो भी सबसे पहले सामने आता है उसी पर गुस्से का गुबार फूट पड़ता है। और, आज अख़्तर मियाँ का दिन था गुस्से के झोंको को झेलने का।

अख़्तर मियाँ: भारतीय ज़नाब आज किस तरफ का रुख़ है?

भारतीय जी: जहन्नुम की तरफ।


अख़्तर मियाँ: क्या हो गया मियाँ? मिज़ाज़ तो ठीक हैं?

भारतीय जी: मेरे मिज़ाज़ को क्या होगा? अपनी सुनाईये – पैंट की कटाई छंटाई कैसी चल रही है?


अख़्तर मियाँ: ऊपर वाले और आप जैसे कद्र-दानों की दुआ है। काम बढ़िया चल रहा है।

भारतीय जी: हमारे जैसे कद्र-दान ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं।

अख़्तर मियाँ: जनाब ऐसी क्या गुस्ताख़ी हो गयी हमसे?

भारतीय जी: अख़्तर मियाँ ये बताईये आप कितने सालों से मेरे कपड़े सी रहे हैं?

अख़्तर मियाँ: यही कोई बीस-तीस साल से।

भारतीय जी: पर आपको अभी तक पैंट में सही ढंग से जेबें लगानी नहीं आई। हाथ डालो कुछ निकालने के लिये तो निकलता कुछ और ही है – मुझको तो लगता है आप कोई जादू टोना फूँक देते हैं मेरी जेबों में।

अख़्तर मियाँ: अचानक पैंटों की जेबों को क्या हो गया? आज तक तो आपने ऐसी कोई शिकायत नहीं की।

भारतीय जी: क्यों कि आज तक ऐसा कोई हादसा ही नहीं हुआ।


अख़्तर मियाँ: अब पहेलियाँ ही बुझाते रहियेगा या कुछ खुलासा भी करियेगा।

भारतीय जी: अख़्तर मियाँ आप को पता है कि पिछले महिने ही पास मे एक अनाथालय खुला है?


अख़्तर मियाँ: हाँ सुना है कि ...

भारतीय जी (बात काटते हुये): बस कल शाम को उसी अनाथालय के प्रबन्धक महोदय अपने साथ बच्चों का एक काफिला ले कर मेरे घर टपक पड़े...

अख़्तर मियाँ: पर जनाब इस हादसे का मेरी पैंट सिलाई से क्या लेना देना?

भारतीय जी: अरे बीच में मत बोलिये। जो कह रहा हूँ बस सुनते जाईये। प्रबन्धक महोदय - क्या नाम था उनका – हाँ, ज्ञानदत्त । हाँ तो ज्ञानदत्त जी ने सबसे पहले तो दस मिनट तक मुझे ये सुनाया कि हमारे देश में कितने लाखों अनाथ बच्चे हैं जिनके लिये कोई भी, यहाँ तक सरकार भी, कुछ नहीं करती है। कैसे उनका अनाथ आश्रम ऐसे बच्चों की देखभाल करता है, स्कूल भेजता है... अरे आप सुन भी रहे हैं?


अख़्तर मियाँ: अरे आप ही ने तो कहा था कि बीच में मत बोलिये, इसी लिये चुप चाप सुने जा रहा हूँ। पर अभी तक मुझे समझ में नहीं आया है कि इसका पैंटो की जेबों से क्या...

भारतीय जी: ज्ञानदत्त जी ने ये भी बताया कि अनाथ आश्रम का खर्चा पानी सामान्य नागरिकों के दान के फलस्वरूप ही चलता है, और ये कहते कहते उन्होंने पीछे छिपे हुये कुछ एक दयनीय बच्चों को पीछे से घसीट कर मेरे सामने ला खड़ा कर दिया। फिर अपने झोले से एक पेन और रजिस्टर निकालते हुए बोले - भारतीय जी, इस अनाथ आश्रम को चलाने में हमारी कुछ मदद कीजिये और सौ, हज़ार रुपये का दान दे दीजिये। बोले – ये बड़ा पुण्य का काम है – मानवता और देश दोनों के लिये।


अख़्तर मियाँ: वो तो सब ठीक है, पर इसका पैंट की जेबों से क्या वास्ता?

भारतीय जी: अरे सुनिये भी तो। मैंने उनकी दिल खोल कर सराहना करी। फिर अपनी पैंट की बाँयी जेब में हाथ डाला। और जब हाथ बाहर निकाला तो मुट्ठी भर दया निकल आई पर ससुरा मेरा बटुआ नहीं निकला। कई बार कोशिश करी, हाथ कई कई तरीकों से डाला, पर कमबख़्त बटुआ तो जैसे कसम खा के बैठा हो कि उसे निकलना ही नहीं है। पर मियाँ गौर करने वाली बात ये है कि दया नॉन-स्टॉप निकलती रही।

अख़्तर मियाँ: अब बात कुछ कुछ समझ में आ रही है...

भारतीय जी: फिर मुझे याद आया कि दायीं जेब में कुछ रुपये रखे हैं। जब दायीं जेब में हाथ डाल कर रुपये निकालने की कोशिश करी तो जेब से ढेर सारी सराहना और तरीफों के पुल तो निकल आये पर रुपये न निकले। फिर से कई बार कोशिश करी, पर रुपये तो मानों जेब से ऐसे चिपक गये थे जैसे अमर सिंह के साथ अमिताभ। हाँ, पर सराहना निकलनी बंद न हुई।

अख़्तर मियाँ: जनाब आपको पूरा यकीन है कि इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ आपके साथ – खासकर के जब कोई आपसे पैसा माँगने आया हो...

भारतीय जी: अरे कभी नहीं मियाँ, कभी नहीं। हाँ ये बात जरूर है कि इससे पहले हमेशा लोग धार्मिक चीजों के लिये पैसा माँगने आये – कभी मंदिर निर्माण के चंदे कि लिये तो कभी माता जागरण, अखंड रामायण और पूजा पाठ जैसे पुण्य कामों के लिये। और, हमेशा मेरी जेब से भक्ति और श्रद्धा के साथ साथ बटुआ भी निकला। यहाँ तक कि चेक बुक भी निकल आई जो कि मैं कभी जेब में रख कर घूमता ही नहीं हूँ। अख़्तर मियाँ मुझे पूरा यकीन है आप जेबों पर जरूर कोई जादू टोना फेरते हो।


अख़्तर मियाँ: भारतीय बाबू ये कोई जादू टोना नहीं है। असलियत तो ये है कि आपकी जेबों में ऊपर वाले के लिये तो जगह है, पर शायद इस ज़मीन पर रहने वालों के लिये नहीं...

इसी बीच दुकान से तौकीर बाहर निकल कर आया और भारतीय जी से बोला – आपने परसों एक पैंट सिलने को दी थी। क्या कहते हैं पीछे एक हिप पॉकेट लगा दूँ?

भारतीय जी कुछ बोलते उससे पहले ही अख़्तर मियाँ बोल पड़े – अरे जा और दोंनो ओर हिप पॉकेट लगा दे। और, उनके ऊपर फ्लैप मत लगईयो, हो सके तो जेबों का साईज़ भी बड़ा ही रखना – क्या पता अगली बार इन्हीं जेबों से भारतीय जी का बटुआ निकल आये।

बात आगे बढ़ती उससे पहले ही सड़क के बीचों बीच खड़े हनुमान मंदिर के लाऊड स्पीकरों से भजनों का प्रसारण प्रारम्भ हो गया। बस भारतीय जी ने अपनी दोनों जेबों में हाथ डाला और दौड़ पड़े मंदिर की ओर माथा टेकने और नमन करने।

- अतुल श्रीवास्तव

बुधवार, फ़रवरी 11, 2009

हे भगवान!

कुछ दिन पहले की ही बात है मैं निराशाओं के बादलों से घिरा हुआ था। सोचा चलो प्रभु से ही याचना की जाये। बस पड़ोस के मंदिर में जा धमका। हर भक्त की तरह मैंने भी सौ डेसिबल का घंटा टनटनाया और हाथ जोड़ कर एक पैर पर खड़े हो कर प्रभु से प्रार्थना की - हे प्रभु! अपने इस भटके हुये भक्त का मार्ग प्रदर्शन करो। 

एक बड़े जोर का धमाका हुआ और जब धुँआ हटा तो अपने समक्ष प्रभु विष्णु को खड़ा पाया। "बोल वत्स तुझे क्या चाहिये?" 

"प्रभु आप भी न मजाक करते है। अभी एक मिनट पहले ही तो कहा था कि अपने इस भटके हुये भक्त को सही रास्ता दिखायें।" 

"वत्स उस समय मैं पारगमन (transit) में था। परंतु तुम चिंतित न हो। समझो तुम्हरी समस्या का निवारण हो गया है। मेरे पास उपाय है।" 

"प्रभु बताईये मुझ तुक्ष प्राणी को क्या करना होगा।" 

"वत्स तुम्हें कुछ नहीं करना होगा। ये GPS Navigation System ग्रहण करो, बस अब तुम भविष्य में मार्ग से कदापि न भटकोगे।" 

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- अतुल श्रीवास्तव 

सोमवार, अगस्त 13, 2007

कल, आज और कल - हैप्पी इंडिपेंडेंस डे!!

नवभारत टाईम्स 15 अगस्त, 1977 आज भारत की स्वाधीनता दिवस के पावन पर्व पर प्रधान मंत्री ने ध्वजारोपण के समय देश की समस्त जनता को बधाई दी और देश वासियों से भारत की बहु-आयामी प्रगति में जुट जाने के लिये आग्रह किया. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कई नगरों में झाकियाँ निकाली गयीं और विद्यालयों में छात्रों के लिये मिष्ठान वितरण किया गया... 
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नवभारत टाईम्स 15 अगस्त, 2015 आज इंडिया की इंडिपेंडेंस डे के मौके पर प्राईम मिनिस्टर ने फ्लैग सेरोमेनी के समय देश की सारी पॉपुलेशन को कॉंग्रचुलेट किया और सभी सिटिज़ेंस से ये रिक्वेस्ट किया कि वो इंडिया की ऑल-डाईमेंशन प्रोग्रेस में लग जायें. आज इंडपेंडंस डे के दिन कई शहरों में परेड ऑर्गनाईज़ की गयीं और स्कूल्स में स्टुडेंट्स में मिठाईयाँ डिस्ट्रीब्यूट की गयीं... __________________________________________________ 
Navabhaarat Times August 15, 2027 Aaj India kee Independence Day ke occasion par Prime Minister ne flag ceremony ke time country kee entire populations ko congratulate kiya aur sabhi citizens se ye request kari ki vo India ki all-dimension progress mein involve ho jayen. Aaj Independence Day ke din kai cities mein parades organize kee gayi aur schools mein students ke liye sweets distribute kee gayee… 

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- अतुल श्रीवास्तव 

वो कौन थी?

राहुल ने बधाई पत्र को उसके आवरण से निकाल कर पढ़ना प्रारंभ किया, “जीवन का अर्ध शतक सफलतापूर्वक पूर्ण करने की हार्दिक बधाई. आशा है शतक के उत्सव में भी हम सबको आमंत्रित किया जायेगा.” 

राहुल ने मुस्कराते हुए सबको धन्यवाद दिया और मेज पर रखे केक पर लगी हुई मोमबत्तियाँ बुझा कर केक को काटने ही जा रहा था कि दृष्टि चौखट पर खड़ी एक छोटी सी लड़की पर जा टिकी. छः या सात साल की वो लड़की मंद मंद मुस्कान के साथ अपने आप को दरवाजे के पीछे छुपाने का असफल प्रयास कर रही थी. राहुल हाथ के इशारे से उसे अंदर बुलाने लगा. सरिता, राहुल की पत्नी, ने पीछे से आकर पूछा, “ये हाथ के इशारे से किसको अंदर बुला रहे हो?” 

“वो चौखट पर जो छोटी सी लड़की खड़ी है उसी को अंदर बुला रहा हूँ. बहुत प्यारी सी है. सोचा उसको भी अपने जन्म दिवस की खुशी में सम्मलित कर लूँ.” 

“पर वहाँ पर तो कोई नहीं है.” 

“चौखट के पीछे ही तो खड़ी थी. लगता है भीड़ देख कर भाग गयी.” 

“पर राहुल चौखट तक कोई आ ही नहीं सकता है. बाहर के गेट पर ताला लगा हुआ है. तुमको कोई भ्रम हुआ होगा.” 

रात पूर्णतः फैल चुकी थी - अतिथियों ने एक बार पुनः राहुल को पचासवें जन्मदिवस की बधाई दी और एक एक कर के विदा ली. सभी लोगों के चले जाने के बाद सरिता ने राहुल से कहा, “थक गये होगे. तुम चल कर सोने की तैय्यारी करो. मैं बस थोड़ी सफाई कर के आती हूँ.” 

राहुल अपने कमरे के दरवाजे तक पहुँचा ही था कि उसे अंदर से एक छोटी लड़की के खिलखिलाने की आवाज सुनाई दी – कमरे में पहुँचा तो देखा वही छोटी लड़की बिस्तर पर उछल रही थी. पर इस बार उसके बाल दूसरी तरह से बने हुये थे और कपड़े भी भिन्न थे. “तुम यहाँ कैसे आ गयी?” 

ये सुनते ही वो बच्ची बिस्तर से कूद कर खिलखिलाती हुई कमरे में इधर उधर भागने लगी और राहुल भी एक बच्चे की तरह उसका पीछा करने लगा, “ठहर. अभी पकड़ कर मैं तुम्हारी खैर लेता हूँ. तुम हो कौन? यहाँ कैसे आई?” 

“राहुल ये क्या बच्चों की तरह भाग दौड़ कर रहे हो? और, ये बातें किससे कर रहे हो?”, सरिता ने पीछे से टोका. 

“अरे वही छोटी लड़की....” 

“राहुल ये अचानक क्या हो गया है तुमको? थक गये हो चलो अब सो जाओ.” 

बिस्तर पर आँख मूँद कर आधा घंटे लेटने के बाद भी राहुल को झपकी नहीं लगी. उठ कर बाहर के कमरे की तरफ चल पड़ा पानी पीने के लिये. जैसे ही राहुल ने फ्रिज खोला, उसकी रोशनी में उसे फ्रिज के बगल में सलवार कुर्ते में सजी एक पंद्रह या सोलह वर्ष की युवती खड़ी दिखाई दी जो राहुल को एकटक देखे जा रही थी. “कौन हो तुम? अंदर कैसे आ गई सारे दरवाजे और खिड़कियाँ तो अच्छे से बंद हैं. तुम्हारी शकल तो बिल्कुल उस बच्ची से मिलती है जो अभी कुछ देर पहले मेरे सोने के कमरे में उछल कूद मचा रही थी. लगता है जैसे कि मैं तुम्हें पहले से जानता हूँ. कृपया अपना नाम बताओ.” 

राहुल की बड़बड़ाहट से सरिता की आँख खुल गयी. सरिता ने बाहर आ कर देखा कि राहुल फ्रिज का दरवाजा खोल कर अपने आप से ही बातें किये जा रहा था. “राहुल तबियत ठीक नहीं लग रही है क्या?” 

“मैं तो ठीक हूँ. पर इस लड़की से पूछो कि ये अंदर कैसे आ गयी.” 

“पर राहुल वहाँ तो कोई भी नहीं है. मुझको तो अब डर लगना शुरू हो गया है. कहीं कोई भटकती हुई आत्मा तो नहीं है? कुछ कहती है तुमसे?” 

“कुछ नहीं. बस मंद मंद मुस्कराती रहती है.” 

“अभी भी खड़ी है वहाँ पर?” 

“नहीं अब चली गयी है.” 

राहुल और सरिता दोनों कमरे में आकर सोने का असफल प्रयास करने लगे. सरिता को नींद नहीं आ रही थी भय के कारण, और राहुल सोच रहा था कि वो बच्ची इतनी शीघ्र इतनी बड़ी कैसे हो गयी. अगले दिन सरिता को कार्यवश घर से बाहर जाना पड़ा. सरिता की अनुपस्तिथि में उसका चाय पीने का मन होने लगा – अतः उठ कर रसोई में जाकर चाय बनाने लगा. पानी के साथ साथ दूध, अदरक और चाय की पत्ती भी खौलने लगे कि राहुल को याद आया कि चीनी का डिब्बा तो बाहर के कमरे में रखा है. वो जब चीना का डिब्बा ले कर लौटा तो देखा कि गैस के चूल्हे के बगल में साड़ी में लिपटी हुई बीस या बाईस साल की एक युवती खड़ी थी. राहुल कुछ कहता उससे पहले ही वो युवती बोल पड़ी, “चाय कबसे बनानी शुरू कर दी? याद है पहली बार जब चाय बनाई थी तो चीनी की जगह नमक डाल दिया था.” 

“तुमको कैसे पता?” 

युवती कोई उत्तर देती उससे पहले ही घंटी बज उठी. राहुल ने दरवाजा खोला. “ड्राई क्लीनिंग करवाने वाले कपड़े तो घर में ही भूल गई थी.”, कहते हुए सरिता अंदर आ गई और राहुल को विचलित देख कर पूछा, ““क्या हुआ राहुल? सब ठीक तो है?” 

“रसोई में एक औरत खड़ी है.” सरिता ने भाग कर रसोई में झाँका, “यहाँ तो कोई भी नहीं है. मुझे तो बहुत डर लग रहा है. ऐसा करो तुम घर में अकेले मत रहो. बाहर जा कर पार्क में टहल आओ. मैं ढाई तीन घंटे में वापस आ जाऊँगी.” 

राहुल ने स्वीकृति में सर हिलाया और अकेले का समय व्यतीत करने के लिये पार्क में जाकर बैठ गया. अपने चारों ओर टहलते हुये लोगों और इधर उधर भागते हुये बच्चों को निहारने लगा कि अचानक उसकी दृष्टि कोने में अकेले खड़ी हुई एक दस या ग्यारह साल की लड़की पर पड़ी. वही चेहरा.... वो लड़की राहुल को अपने पास बुलाने लगी और राहुल सम्मोहित सा उसकी ओर बढ़ चला. थोड़ी ही देर में राहुल भी उस लड़की के साथ बाकी के बच्चों की तरह खिलखिलाते हुये भाग दौड़ करने लगा. समय कब व्यतीत हो गया उसे तब पता चला जब पीछे से सरिता की आवाज आई, “घर चलें?” 

रास्ते में बगल में रहने वाले शर्मा दम्पति मिले. श्रीमति शर्मा ने सरिता से कहा, “आज तो भाई साहब बिलकुल बच्चों की तरह पार्क में खेल रहे थे और वो भी अकेले.” 

“पर मैं अकेले...” राहुल ने अपना वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया. 

“चलो पार्क में तुम्हारा मन लग गया. पर अकेले ही भाग दौड़...”, घर पहुँच कर सरिता ने राहुल से कहा. 

“मैं अकेले नहीं था. मैं तो एक दस या ग्यारह साल की लड़की के साथ... और अचंभे की बात तो ये है कि उसकी शक्ल बिल्कुल उस छोटी बच्ची, किशोर लड़की और युवती से मिलती जुलती थी.” 

“राहुल तुम मुझे बहुत डरा रहे हो. मैं सोच रही हूँ पंडित जी को बुलाया जाये. खैर मैं खाना बनाने जा रही हूँ जब तक तुम ऊपर वाले कमरे का फ्यूज़ बल्ब बदल दो. मैं बल्ब ले आई हूँ बाहर के मेज पर रखा है.” 

राहुल ने बल्ब उठाया और ऊपर के कमरे की ओर चल पड़ा. ऊपर पहुँचा तो उसने देखा कि कमरे में रखी हुई कुर्सी पर गुलाबी रंग का सलवार कुर्ता पहने हुये लंबे बालों वाली लगभग उन्नीस वर्षीय एक युवती बैठी हुई है. “कौन हो तुम? हर बार अलग अलग वेश-भूषा और आयु में दिखती हो.... मेरे अतिरिक्त किसी और को क्यों नहीं दिखायी देती हो?” 

“राहुल मैं मात्र तुम्हारे जीवन का अंश हूँ किसी और को कैसे दिखाई पड़ सकती हूँ? तुम्हें पता है मैं कौन हूँ परंतु न जाने क्यों तुम मुझे स्वीकार करने का साहस नहीं कर पा रहे हो.” 

“नहीं पता है मुझे कि कौन हो तुम. क्या नाम है तुम्हारा?” 

“मेरा नाम जानने की जिज्ञासा है? मेरा नाम स्मृति है.” 

ये सुन कर राहुल कुछ देर चुप रहा और फिर धीरे से बोला, “स्मृति – मेरे बचपन और युवा अवस्था की स्मृति. स्मृति, तुम बहुत निष्ठुर हो.” 

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- अतुल श्रीवास्तव 

टिस्क!

मेरे एक पुराने घनिष्ठ मित्र हैं आत्म त्रिवेदी. सातवीं कक्षा से लेकर बारहवीं तक मैं और मेरे समस्त साथी गण इन्हें पंडत (पंडित का बिगड़ा रूप) कह कर ही सम्बोधित करते आये हैं. जब हम सबने नवीं कक्षा में पदार्पण किया तो चिकित्सक बनने की चाह वालों ने जीव विज्ञान और अभियंता बनने का स्वप्न देखने वालों ने गणित का चयन किया. पंडत हिन्दी का पुजारी और भक्त था. जयशंकर प्रसाद और रामधारी सिंह “दिनकर” जैसे लोग उसके प्रेरणा पात्र थे. पंडत का स्वप्न था एक कवि, लेखक और उद्घोषक बनने का. अतः बिना किसी झिझक के उसने जीव विज्ञान और गणित का परित्याग कर के संस्कृत के चरणों में मस्तक रख दिया. 

समय बीता – कुछ यार दोस्त डॉक्टर बन गये और कुछ रो पीट कर अभियंता. और, पंडत इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी और संस्कृत का विद्वान बन कर प्रकट हुआ. पंडत के लेख और कवितायें धर्मयुग और सारिका जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपने लगे. कुछ ही वर्षों में भारी भरकम वेतन के साथ एक मासिक हिन्दी पत्रिका का संपादक भी बन बैठा. पर ये सब तो लगभग बीस-पच्चीस साल पुरानी बात है. समय कुछ अधिक तेजी से ही बदला. समय के हथौड़े से धर्मयुग जैसी पत्रिकाओं की दोनों टाँगें टूट गयीं - कुछ समय तक तो घिसट घिसट कर चलती रहीं, पर अंततः लाभ और हानि के आँकणों के सामने आकर दम तोड़ दिया. अब भला पंडत की छोटी सी पत्रिका की क्या औकात - उसे भी कुछ वर्षों के उपराँत आत्म-दाह करना ही पड़ गया.  
तैंतालीस वर्ष की आयु में पंडत एक बार पुनः ढंग की नौकरी ढूँढने में लग गया. घर में बीबी उलाहना देती फिरती – अरे अगर अंग्रेजी में कुछ किया होता तो कम से कम “एक महिने में फ़र्राटे दार अंग्रेजी बोलना सीखें” जैसे कोचिंग कॉलेज में ठीक ठाक नौकरी मिल जाती. पंडत का पंद्रह साल का किशोर लड़का भी दुखी रहता कि उसके “डैड” बिलकुल भी “कूल” नहीं है. पंडत के पास कुछ एक हिन्दी के समाचार पत्रों से प्रस्ताव आये, पर इन समाचार पत्रों के हिन्दी के निम्न और घटिया स्तर को देख कर उसका मन खिन्न हो उठा. साथ में उसे ये भी लगा कि इन समाचार पत्रों में नौकरी करने से वो कभी भी अपने पुत्र के लिये एक “कूल डैड” नहीं बन सकेगा. बस इसी उधेड़बुन के साथ पंडत मेरे साथ बैठा चाय की चुस्कियाँ ले रहा था, और साथ में बैठे थे मेरे एक और मित्र राजीव सिंह. 

राजीव ने पंडत की करुण गाथा सुनी और गला खंखारते हुये पंडत को सलाह दी, “त्रिवेदी भाई आप कहानियाँ लिखते हो, कवितायें रचते हो. अपने इन गुणों का सदुपयोग “बॉलीवुड” में क्यों नहीं करते हो? और, आपके बेटे को भी ये कहते हुये गर्व होगा कि उसका “डैडी” भी बॉलीवुड की एक हस्ती है. अगर आप जरा भी रुचि रखते हों तो बेझिझक मुझे बतायें मैं आपकी भेंट बॉलीवुड की कुछ हस्तियों से करवा दूँगा.” 

मैंने राजीव को एक तिरछी प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा. राजीव ने मेरी ओर मुस्कुराते हुये कहा, “अरे भाई ऐसे क्यों देख रहे हो. मुम्बई में नौकरी के साथ साथ रंगमंच पर भी काम करता हूँ. उसी के जरिये किरन गौहर से भेंट हो गयी और उसकी तीन चार फिल्मों में छोटी मोटी भूमिकायें करने को मिल गयीं. किरन से मेरी ठीक ठाक जान पहचान है.” 

पंडत ने उत्सुकता से कहा, “हाँ एक महिला के लिये साहित्यिक कार्य करना अच्छा भी रहेगा क्यों कि पुरुषों की अपेक्षा महिलायें अधिक संवेदनाशील होती हैं.” 

राजीव ने हँस कर उत्तर दिया, “त्रिवेदी भाई, किरन गौहर कोई औरत वौरत नहीं बल्कि आदमी हैं. हाँ हाव भाव अवश्य महिलाओं जैसे हैं. लगता है आपने उनकी ब्लॉक-बस्टर फिल्में देखी नहीं हैं. ‘कभी सुट्टा कभी रम’, ‘कभी आलू बड़ी न खाना’ और ‘कब्ज़ हो न हो’ जैसी महान कृतियाँ उन्हीं के दिमाग की उपज हैं.” 

 खैर, पंडत ने राजीव की सलाह स्वीकार कर ली और पहुँच गया मुम्बई अपनी लेखनी से सबको सम्मोहित करने. पंडत का सौभाग्य कि किरन ने “क” अक्षर से एक और “कूड़ा” बनाने का निर्णय लिया और एक नये गीतकार की खोज प्रारंभ हो गयी. राजीव भी मौके का लाभ उठाते हुये पंडत को लेकर किरन के समक्ष उपस्थित हो गया. किरन ने मुस्करा कर पंडत और राजीव से पूछा, “विल यू लाईक टु हैव कॉफी विद किरन गौहर.” 

सारी बेकार की औपचारिकताओं के बाद किरन ने पंडत से कहा, “आत्म डियर, हेयर इज़ ए सीन फ्रॉम माई न्यू मूवी. हेरोईन इज़ गेटिंग मैरिड. हर फ्रेंड्स ऐंड रिलेटिव्ज़ आर सिलेब्रेटिंग, डाँसिंग ऐंड सिंगिंग. कैन यू राईट ए नाईस साँग फॉर दिस सिचुएशन?” 

पंडत हाथ में कलम और एक पन्ना लेकर कोने में जा बैठा. करीब आधा घंटा तक सर खुजाने के बाद पंडत के दिमाग के घोड़े थोड़े गतिशील हुये. कुछ देर के बाद वो किरन के समक्ष अपनी रचना लेकर उपस्तिथ हुआ -

सखी तुझे इस पावन बेला पर क्या दूँ मैं उपहार, 
बस प्यार के इस दोने में कर कुछ स्मृतियाँ स्वीकार. 
जब पिया जायें परदेस, और अकेली हो तुम साँझ सवेरे, 
चुम्बन कर लेना दोने का, आ जाऊँगी झूले की पेंग लगा आँगन में तेरे. 

“होल्ड इट होल्ड इट.” किरन ने झुँझलाते हुये कहा, “ये कौन सी लैंग्वेज़ में लिख रहे हो? आई आस्क्ड यू टु राईट इन हिन्दी, नॉट इन संस्कृत. ये सब कौन से वर्ड हैं? हू विल अंडरस्टैंड दीज़ – दोना, स्वीकार, उपहार ऐंड समरितया व्हाट एवर दैट इज़. आई वान्ट समथिंग मॉडर्न, पेपी ऐंड स्टाईलिश.” 

पंडत को एक हजार वोल्ट का झटका लग गया. बेचारा आँसुओं को किसी तरह रोक कर राजीव के साथ भौंचक्का सा वापस घर आ गया. उसी शाम को राजीव के घर राजीव के एक सॉफ्टवियर इंजीनियर मित्र नितिन पधारे. पंडत से भी मिले. कॉफी पी, समोसे खाये और साथ में गीत लेखन से संबन्धित सुबह का किस्सा सुना. नितिन ने हँसते हुये कहा, “आत्म यार तुम भी कहाँ अकल के घोड़े दौड़ाने में लग गये. कंप्यूटर का जमाना है. अब अगर कंप्यूटर सारे वाद्य यंत्रों की जगह ले सकता है तो गीत की धुन क्यों नहीं बना सकता है? अरे मैं तो यह भी कहूँगा कि गीत की रचना क्यों नहीं कर सकता है? मानता हूँ कि ऐसे गीतों में कोई भावना या मादकता नहीं होगी, पर आजकल संगीत भी तो हर चीज की तरह एक प्रयोज्य (disposable) वस्तु होकर ही तो रह गया है. मैंने एक सॉफ्टवेयर लिखा है “टिस्क” (TISC – The Incredible Song Constructor). आप इसमें अपने मनपसंद शब्दों की सूची डाल दीजिये, “गीत रचना” बटन पर क्लिक कीजिये – बस मेरा जादुई “टिस्क” शब्दों की सूची में से कुछ शब्दों का चुनाव कर के उन्हें एक अनियमित क्रम में रख कर गीत बना डालेगा. मैं अभी ऑफिस से ही आ रहा हूँ. मेरा लैपटॉप साथ में है, अगर तुम चाहो तो “टिस्क” का प्रयोग कर के देख लो.” 

पंडत ने मरे मन से कहा – चलो ये भी कर के देख लिया जाये. लैपटॉप चलाया गया. “टिस्क” में गीत श्रेणी चुनी गयी “मॉडर्न”. “मॉडर्न” श्रेणी के लिये नीचे लिखे शब्द पहले से ही शब्द-सूची में पड़े हुये थे: 

माही 
बल्ले बल्ले 
हड़िप्पा 
चूड़ियाँ 
शरारा 
बेबी 
पार्टी 
लव यू 
कुड़ी 
किस 
आई वाना (वांट टू) 
आहा आहा 
यो कूल 
रब्बा 
ओ या 
गल 
नसीबा 

और भी कई अंग्रेजी और पंजाबी के शब्द.... पंडत ने धड़कते हृदय से “गीत रचना” वाला बटन क्लिक कर किया, और ये लो लैपटॉप की स्क्रीन पर एक “मॉडर्न” गीत तैय्यार हो कर आ गया: 

ओ या आहा आहा 
ओ या यो बेबी यो बेबी, 
ओ या आई वाना टेल यू 
आहा आहा वाना वाना टेल यू बेबी 
यू कूल यू क्यूट, 
आई लव यू ओ या ओ.... 
माही.. माही वे... 
रब्बा तेरे नसीबा आया... 
एक कूल डूड... 
हाऊज़ दैट.. 
हियर इज़ द पार्टी... 
ओ या मैं हाथों विच लगा दे मेंहदी.. 
बालों विच लगा दे गजरा.. 
पहन दे शरारा... 
यो बेबी यू डाँस. 
मेरी प्यारी कुड़ी बनी एक दुल्हन... 
आई वाना किस यू, वाना वाना किस यू बेबी... 
हाऊज़ दैट.. 
ओ या. 

ये पढ़ कर पंडत ने अपना माथा मेज पर दे मारा, बोला, “ये क्या कचरा है. इसको गीत कहते हो?” 

नितिन ने तत्परता से कहा, “अरे पहले इसे किरन को सुना कर आओ फिर कुछ कहना.” 

अगले दिन सुबह सुबह ही पंडत और राजीव जा पहुँचे किरन के घर और पंडत ने एक ही साँस में “अपना” नया “साँग” सुना डाला. “साँग” खतम होने के बाद कमरे में कुछ देर शांति छाई रही, फिर अचानक किरन ने दौड़ कर पंडत को गले लगाते हुये कहा, “फेंटास्टिक, सुपर्ब, माईंड-ब्लोईंग.” पंडत की बोहनी हो गयी और वो एक बार पुनः प्रसिद्धि के पथ पर चल पड़ा. 

पिछले हफ्ते काम के सिलसिले में मुम्बई जाना हुआ. पंडत से मिलने उसके घर भी गया. घर और घर की साज सज्जा से पंडत की नयी संपन्नता झलक रही थी. मैंने पंडत से उसके पुनर्जन्म और नये अवतार के बारे में पूछा. एक लम्बी सी आह भरते हुए पंडत ने कहा, “लड़का मुझ पर गर्व करने लग गया है. बीबी भी खुश रहती है. लक्ष्मी देवी भी कृपालु हो गयी हैं. पर ये सब मुझे प्राप्त हुआ है आत्म त्रिवेदी की हत्या कर के. बस यही सोच कर हृदय से ग्लानि का बोझा हटाने का प्रयत्न करता हूँ कि आत्म त्रिवेदी को मैंने अकेले ही नहीं मारा है. उसके और उसके जैसे कई और लोगों की आसमयिक मृत्यु के लिये भारत के कई बड़े नगरों की बड़ी जनसंख्या उत्तरदायी है. 

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- अतुल श्रीवास्तव