विचरण
सोमवार, मई 18, 2020
श्याम स्तुति
सोमवार, अप्रैल 13, 2020
मुशाहिदा
नीले आसमाँ को ढके वो काले गुबार भी न जाने कहाँ बह गये हैं।
कुछ अजब है माहौल कि अब कानों में सिर्फ सन्नाटा ही है गूँजता,
क्या फिर से जमेंगी महफिलें आज हर इंसान बस यही है पूछता।
वक्त के इस हेर फेर में फिर से खुद बखुद हो रहे हैं आबाद।
उड़ाते थे जो मजहबी पतंगें, उनकी डोरियाँ अभी कटी सी हैं।
जाना हम में भी हैं कुछ छिपे हुनर और हमारा भी एक फ़साना है।
अंजाम कैसा होगा कल का ये तो हौवा के बच्चों को ही आज़माना है।
****
- अतुल श्रीवास्तव
मुशाहिदा: observation, closely watch
रेहलत: Exodus, Departures
हौवा: In Islam आदम is believed to have been the first human on Earth. हौवा was his wife - "mother of mankind". Similar to Manu and Satarupa in Hinduism. Satarupa is regarded as the first woman to be created by Brahma along with Manu.
मंगलवार, फ़रवरी 11, 2020
मुल्क
तो एक चिंगारी ही काफी है सारा जहाँ जलाने को।
हम तो कभी गलत हो ही नहीं सकते,
ऐसी गलतफहमी ही काफी है दूसरों को गलत बताने को।
आईने में कभी खुद को देखने की ज़ुर्रत न की,
पर कतराते नहीं दूसरों की बदसूरतियाँ गिनाने को।
दिल-और-दिमागों में दूसरों का बेतुका खौफ बिठा दो,
ये कारनामा ही बहुत है ज़मीं पर कयामत ढाने को।
हमसे रज़ामंद हो और सिर्फ हमारे ही साथ चलो,
काफी है ये नारा दूसरों पर गद्दारी की मोहर लगाने को।
झूठ की कहानियाँ बुनो और उसको ही सच बतलाओ,
और क्या चाहिये खून और आँसुओं की दरिया बहाने को।
मुल्क की तारीख अपने हिसाब से लिख डालो,
यही एक तरीका बचा है देश को महान कहलाने को।
तुम काफ़िर, तुम गद्दार और तुम हो दहशतगर्द,
बस यही संबोधन बचे हैं एक दूसरे को बुलाने को।
डर, मजहब और नफरत की लाठी लो, और चलाओ,
सबसे बेहतरीन तरीका है ये मूर्खों पर राज तख्त बिछाने को।
***
- अतुल श्रीवास्तव
रविवार, दिसंबर 29, 2019
वाणी
चक्षु माँगे कुछ नींद के पल,
वाणी तुम्हारी सरस, आ जाये
बन वृष्टि का जल, नित्य चंचल।
तुमुल विषाद जब करे गर्जना,
शिथिल पड़ने लगे चेतना,
राग तुम्हारी मरु पर यूँ छाये,
मूर्छित धरा स्वयं शाद्वल बन जाये।
तिमिर-विरह डसने को व्याकुल,
झुलसाती मन बन कर बाहुल,
मलय बन जाये तब तेरा गान,
कभी भक्ति-ज्ञान, कभी मदिरा का पान।
चिर एकांत एक प्राचीर बना दे,
नीरवता को अभेद्य करा दे,
तब बोल तुम्हारे मन को भाये,
आशा की लता स्वयम उपजित हो जाये।
चंचल पुलकित मन जब झूम के गाये,
स्वर-लिप्त तुम्हारे बोलों का सानिध्य ये पाये,
आभार अतुलनीय, शब्दों के परे,
हृदय करबद्ध मात्र वंदन ही करे॥
****
- अतुल श्रीवास्तव
तुमुल: प्रचंड
शाद्वल: मरु उद्यान
बाहुल: अग्नि
तिमिर: अंधकार
चिर: लम्बी, दीर्घकालीन
प्राचीर: चारदीवारी
सानिध्य: निकटता
बुधवार, अगस्त 07, 2019
सखि यदि वो तुमसे कहने आते
यशोधरा के इस अभियोग के प्रत्युत्तर में उस सखि ने क्या कहा होगा? इसको मैंने अपनी इस कविता "सखि यदि वो तुमसे कहने आते" में व्यक्त करने का प्रयास किया है:
*सखि यदि वो तुमसे कहने आते*
मात्र मानव थे कोई बुद्ध तो नहीं,
अश्रुपात का वार क्या ह्रदय पर सह पाते?
हे सखि, यदि वो तुमसे कुछ कहने आते।
अधरों का चुंबन, यौवन का सम्मोहन,
इस रूप का आमंत्रण ठुकरा, क्या पलट कर जा पाते?
हे यशोधरा, यदि वो तुमसे एक पल को मिलने आते।
शिशु राहुल का निरीह क्रंदन, गोदी को आतुर हाथों का कंपन,
पितृ हृदय को विचलित कर जाते, वो मुँह मोड़ न पाते।
सखि यदि वो तुमसे कहने आते, स्वयम को पुनः असहाय ही पाते।
यदि वो कहने आते, व्यक्त किये उन्माद क्या उनके मन को भाते?
दशा तुम्हारी देख वस्तुतः स्वयम के निर्णय पर पछताते।
संशय के नीरद छा जाते, यदि वो कुछ कहने को आते।
रण में जाने की अनुमति दे देती हो, पर रण और इसमें अंतर है,
रण का निश्चित परिणाम पुनः आगमन की एक आस हैं लाते।
अब न लौटूँगा, क्या ये शब्द तुम्हारे मन को भाते?
यशोधरा, सत्य कहो, स्वार्थ ग्रसित हृदय क्या समर्पण भाव को लाते,
या विच्छेद भाव के भय से मात्र विरह गीत ही गाते?
आसक्ति तुम्हारी क्या गौतम को मोह जाल में न उलझाते?
संताप तुम्हें कि प्रस्थान पूर्व गौतम ने क्यों पीड़ा न कही,
पीड़ा का कारण उपेक्षा नहीं, अपेक्षा जो हम तुम में बसी।
हे सखि, यदि वो कह कर भी जाते, अपेक्षा तदापि शोक भाव ही लाते।
कटु सत्य प्रिये यदि बोलूँ मैं, नाम-मात्र सिद्धार्थ ही रह जाते,
सिद्धार्थ* कदापि न कर पाते, यदि वो तुमसे मिलने आते,
मात्र गौतम ही रह जाते, गौतम बुद्ध न वो बन पाते।
*****
- अतुल श्रीवास्तव
* सिद्धार्थ: सिद्ध (Prove. Can be used for Achieve/ Accomplish) + अर्थ (meaning. Can be used for goal) - One who achieves his goal.
मंगलवार, जून 18, 2019
उलाहना
विचलित न करें घृणा, द्वेष, हिंसा, मैं हूँ हैरान।
बुद्धि है पाई पर क्यों है प्रस्तर सा ज्ञान?
धरा ही रहने दो, बना न इसको नर्क समान।
आध्यात्म की बातें सुनते और कहते हो,
और घृणा का कुटिल वार भी करते हो।
क्या विवषता कि विविधिता नहीं सह सकते हो?
क्या यही धर्म कि मारते और स्वयम भी मरते हो?
व्यर्थ न करो अपने पुष्पों का अर्पण,
कर अविरत संक्षोम पल पल प्रति क्षण।
बहुत हो गई यज्ञ, अर्चना अब तो देखो भीतर का दर्पण,
क्या मानवता नहीं योग्य सम्पूर्ण समर्पण?
धामों का भ्रमण तो कर आया,
क्यों क्रोध न वश में कर पाया?
भजन, वंदना तो अविरत गाया,
त्याग न सका छल की छाया, धन की माया।
निराधार नर संहार वसुधा पर क्यों होता है?
वो अंतर्यामी क्या बस सोता है?
क्यों न अपनी ही रचना पर रोता है?
क्यों हो गया अदृश्य या मूक प्रस्तर समान?
विचलित न करें घृणा, द्वेष, हिंसा, मैं हूँ हैरान।
- अतुल श्रीवास्तव
गुरुवार, अप्रैल 11, 2019
अस्थिर चित्त
ये भ्रम है तुम्हें कि हूँ मैं तुमसे रूठी।
इधर मैं हूँ जीवन, सखियों का सहारा,
उधर ध्यान क्यों है, वहाँ कौन है तुम्हारा?
पंछी का कलरव, दिनकर की लालिमा,
शशि की चंद्रिका और ग्रंथों की गरिमा।
विषादों को ढकने खिली हर्ष की लता है,
उधर क्या मिलेगा ये किसको पता है।
इधर ही मिलेगा सुख दुख में आलिंगन,
अधर पर, कपोल और मस्तक पर चुम्बन।
उधर की मृगतृष्णा हेतु चिंतित क्यों रहना,
गंगा यहीं है और निर्मल आनंद का झरना।
दृष्टा निहित है तुम में इधर ही,
इधर न विदित हो तो उधर भी नहीं।
जो देते हैं भय, लोभ तुमको उधर की,
यदि न खोजा इधर तो क्या पायेंगे उधर भी?
इधर ध्यान दो, मैं हूँ इधर ही,
सूर्यास्त उपरांत इधर है सहर भी।
स्थिर मन से खोजो, सब कुछ यहीं है,
क्यों भ्रमित हो, उधर कुछ भी नहीं है।
उधर क्या देखते हो इधर मैं हूँ बैठी।
ये भ्रम है तुम्हें कि हूँ मैं तुमसे रूठी।
- अतुल श्रीवास्तव
शुक्रवार, जनवरी 04, 2019
वैतरणी
मुझे अभी धरा पर रहना है, मनुष्य तो हूँ पर मानव बनना है।
परलोक भी है क्या कोई कहीं, मिथ्या तो नहीं, कोई छल तो नहीं?
स्थिर क्यों बैठूँ एक कुंड समान, मुझे एक सरिता बन कर बहना है।
क्या सुनी सुनाई को मैं मानूँ, या इस जग के अचरज को पहचानूँ?
एक पंछी बन विचरण करना है, अपनी गाथायें कहना है।
उस जीवन पर क्यों चिंतित रहूँ, क्यों इस जीवन में भ्रमित रहूँ?
बादल हो पर्वत पर जाना है, हिम बन कर शिखर पर गिरना है।
यज्ञ हवन से क्या कुछ होता है, होता तो हर प्राणी क्यों रोता है?
अभी तो सब वर्णों को अपनाना है, एक इंद्रधनुष बन जाना है।
क्या स्वर्ग सजा ऊपर है कहीं, दिखता न वो तुझको क्यों न यहीं?
इस स्वर्ग में एक झरना बनना है, मुझको घाटी में निर्झर झरना है।
क्यों वैतरणी के पार की सोचूँ, क्यों उस लोक का द्वार मैं खोजूँ?
धरणी के विस्तृत सौंदर्य में अभी भटक भटक स्व को पाना है।
- अतुल श्रीवास्तव
बुधवार, जनवरी 02, 2019
निवेदन
मंडराते श्यामल मेघों को तनिक थम जाने तो दे।
कर आलिंगन बन जा तू भी थोड़ी साँवली,
इन देवों को गरज कर अमृत बरसाने तो दे॥
शाँत हो, यूँ क्यों हो रही तू उतावली,
नभ से अम्बुद का मकरंद थोड़ा निचुड़ जाने तो दे।
जल को तरसे नर, नारी, हर नगरी की बाओली,
थम जा, क्षुधा थोड़ी सी धरा की बुझ जाने तो दे।
भगाना नहीं, उड़ाना नहीं, इन श्याम देवों को तो है तुझे बहलाना,
फिर सरिता की तरंगों पर उमंगों की पतवार ले स्वच्छंद लहराना।
गिरती जलद मोतियों को अपने आँचल से इधर उधर बिखराना,
हो जाये वसुधा जब भूरी से हरी, तब फिर पंख लगा सबको सहलाना।
इतराती पवन, न बन तू इतनी बावली,
उठते हाथों पर कुछ एक बूँद जल की गिर जाने तो दे।।
- अतुल श्रीवास्तव
शुक्रवार, दिसंबर 28, 2018
असमंजस
शब्द निःशब्द क्या अंतर जब दोनों भ्रम नष्ट न करें।
कब जोड़ें, कब तोड़ें, शब्दों का जाल ये सारा,
मूक बने कभी शूल, कभी बन जाये अमृत की धारा।
अर्थ हो अनर्थ शब्दों के कहने के ढंग से,
और कभी छिड़ जाये होली लहुओं के रंग से।
निःशब्द बने सहमति कभी शब्दों के विष की ,
और कभी मौन धरना की ढाल बने हर कोशिश की।
शब्द निःशब्द क्या अंतर जब दोनों कहर ही ढायें,
शब्द निःशब्द क्या अंतर जब दोनों सहर न लायें।
- अतुल श्रीवास्तव
बुधवार, अगस्त 22, 2018
घूसखोर
- अतुल श्रीवास्तव
शनिवार, अगस्त 18, 2018
नीर
जल जायेगा, सूख गयी जो जल की चादर।
वैतरणी अब पार करेगा कैसे,
तरंगिणी बना दी एक विष की धारा।
बिन पय, अंजलि कैसे हो अर्पण,
ये जग क्या, तू वो जग भी हारा।
चुल्लू में न अब तो पानी भरो,
आँखों का पानी न सूखने दो,
वारि पर पातक वार न हो,
अब कुछ तो करो, और कुछ तो कहो।
मेघपुष्प जब बुझ जायेगा,
निर्झरिणी सलिल न बह पायेगा,
पंछी का कलरव तब क्या गायेगा?
ये गौरैय्या भी माँगे अम्बु, उदक,
ताकि नाच सके ये उछल उछल और फुदक फुदक।
- अतुल श्रीवास्तव
शनिवार, जून 16, 2018
गौरैय्या
सपनों के दाने चुगता कभी लपक लपक कभी रुक रुक के।
लघु काया पंख भी छोटे, पर उड़ने की आशा नभ विशाल,
कभी पर्वत, कभी घाटी, कभी मरु के विस्तार में हूँ निहाल।
सूरज का उगना, सागर में गिरना, झरनों की बूंदें, सरिता का कलरव,
मन पुलकित हो जाये बहक बहक और मचल मचल।
गौरैय्या मैं मंडराती रहती इधर उधर, हर क्षण, हर पल।
झरनों को निर्झर बहने दे, घाटी में ओस बिखरने दे, नदिया है - उसको भी बहना है।
वृक्षों की बाहों पर चढ़ कर भीतर के स्व व स्वर को जगा,
विदित तभी होगा तुझको क्यों गौरैय्या नाचे उछल उछल,
फुदक फुदक और मचल मचल, हर क्षण और हर पुलकित पल।
- अतुल श्रीवास्तव
मंगलवार, मार्च 22, 2016
धर्म
यत्र, तत्र, सर्वत्र - हिंसा का ताप ।
घृणा का विष, अज्ञानता का आधार,
भय की आधारशिला, तर्क निराधार ।
दैविक प्रलोभन, धर्मोचित नरसंहार,
कुप्रथा, प्रणाली, मानवता पर प्रहार ।
मरीचिका की पराकाष्ठा, ठगी अपरम्पार,
कोटि भ्रम जाल, मिथ्या का अंधकार ।
युद्ध, अज्ञानता, हिंसा, घृणा, रक्तपात,
धर्म, धर्मांध - असहनीय ये आघात ॥
- अतुल श्रीवास्तव
शनिवार, नवंबर 14, 2015
शीतल बयार
- अतुल श्रीवास्तव (सियरा में मौसम का पहला हिमपात)
सोमवार, नवंबर 04, 2013
मानव
धूप लू में बाहें फैला, छाँव के आँचल से कुटिया को सहलाता था।
अब उन्हीं गगन चूमती कुटियों की छाँव में पलता हूँ,
कब पड़ेगा वार आरियों का, यही सोच कर डरता हूँ॥
- मैं हूँ पेड़।
लहरा लहरा आँचल से अपने उसके मैले तन को धोती थी,
प्यार भरे इस आँचल में उसके गंदे कर्मों को ढोती थी।
अब नम आँखों से उसी से मैं कर बद्ध निवेदन करती हूँ,
साफ करो अब तुम तन मेरा बस इसी आस से बहती हूँ॥
- मैं हूँ गंगा।
अपनी जटाओं से भेद कर बादल मैं उसकी प्यास बुझाता था,
अपनी गोदी में फल फूल लिये उसके मन को बहलाता था।
मेरे ही कंधे पर चढ़ कर वो काट रहा मेरा तन मन,
अब भेद न पाऊँ वो बादल जो विचरण करते उच्च गगन॥
- मैं हूँ पर्वत
लम्बे हाथों को फैला कर उन सब की रक्षा करता था,
मानव के तीर कमानों की वर्षा से बचा कर रखता था।
मेरे ही हाथों को काट काट वो मुझको कुचले जाता है,
मेरे परिवार के लोगों को मार मार अपना भवन सजाता है॥
- मैं हूँ जंगल/ हम हैं पशु पक्षी
- अतुल श्रीवास्तव
सोमवार, अक्टूबर 21, 2013
पुनरागमन
सिमटते दिवसों की शिथिलता से अंतर्मन क्षोभित भी था।
प्रणय गीतों को रचने वाली विलुप्त हो रही वो भाषा थी,
ह्रदय तल में पनप रही परिवर्तन की आशा थी, उन्मुक्त होने की अभिलाषा थी।
परिवर्तन की आशा ने चहचहाती संध्या का आव्हान किया,
तुम धीरे से निकल गयी, न शोक हुआ, न विरह गीत का गान किया।
हर्ष हुआ, उल्हास हुआ, अपनों के संग आहाते में बैठ हास हुआ परिहास हुआ,
परिवर्तित इन कालों में भ्रमण, विचरण और रवि-किरणों से स्नान हुआ।
हुआ समय व्यतीत, असहनीय हो चुभने लगा परिवर्तन का बढ़ता ताप,
सम्भवतः तुम्हारा गमन वितरित कर गया क्षणिक परिवर्तन पर एक मूक श्राप।
अनुभूति हुई तुम्हारे स्पर्श की आज उषा काल की बेला में ,
तुमसे मिलने की एक आस जगी, मैं लतपथ हूँ इस मेला में।
शीत लहरी की लघु पेंगो पर तुम आती हो, फिर जाती हो,
आगमन का मन है इसका निश्चय क्यों न कर पाती हो?
विडम्बना है और ये विदित है तुमको कि जब फिर से तुम आओगी,
मुझको एक बार पुनः तुम अपने से दूर भागता ही पाओगी।
छूने का प्रयत्न करोगी, तो मैं छुप जाऊँगा परतों में कपड़ों की,
दूर दूर भागूँगा और बना लूँगा कुटिया कम्बल के टुकड़ों की।
तिस पर भी आधीरता से है तुम्हारे पुनरागमन की अभिलाषा,
क्यों कि ह्रदय तल में फिर से पनप रही है परिवर्तन की आशा।
ओ शीत ऋतु तुम ठुमक ठुमक चपल गति से आ जाओ,
कुछ माह सही, अब आकर के कुछ कोहरे के बादल बिखरा जाओ।
- अतुल श्रीवास्तव
मंगलवार, सितंबर 25, 2012
मानसून
क्षीण करो ये ताप का बन्धन।
धो डालो ये ताप-वेदना, अब बूँदो को बहने दो,
नूतन आशा देंगी,इन बूँदो को निर्झर झरने दो।
बूँदो का विचलित प्रवाह ताप हरेगा,
काले मंडराते मेघों का कुछ ह्रास करेगा।
धुँधले पड़ते शीशों को धो डालो, अब बूँदो को गिरने दो,
खुशियों का आव्हान करो,न इन बूँदो को थमने दो।
बूँदों की सलिल-सरिता मरुभूमि में अंकुर जन्मेगी,
सतहों के भीतर दबे हुये बीजों को जब ये सींचेगी।
बीते काल के आघातों को बहने दो,न इन बूँदों को जमने दो,
आस जगेगी, बहने दो - इन आसुओं को सब कहने दो॥
- अतुल श्रीवास्तव
सोमवार, अगस्त 20, 2012
"शेयर" करें
पास आकर धीमे से बोले बात करन क है तुमसे भैय्या।
तनिक बतावा हमका बबुआ काहे हमका सब जन भूले,
इक काम करा दो हमरा तो तोहरी भी सम्पत्ति क्षण क्षण फूले।
अब यही तरीके भक्त बढ़ेंगे और यही तरीका लगे फेयर।
हाथ फैलाये खड़े मिले हैं हर मंदिर मंदिर द्वारे द्वारे।
फिर देखो भक्तन की कैसी और शेयर करन की झड़ी लगेगी।
भय सबसे बलवान शस्त्र है हाथन में लेने से न तनिक डरो।
शेयर करो नहीं तो बन जईहो अंधा, लंगड़ा और इक हाथ से लूला।
- अतुल श्रीवास्तव
मंगलवार, अप्रैल 26, 2011
कटु सत्य
लोग कहते हैं कि भगवान के घर देर है पर अंधेर नहीं। इतने सालों के बाद भगवान को भी अपनी गलती पर ग्लानि हुई कि ऐसी नेक आत्मा को भारत में क्यों ढकेल दिया। प्रभु ने सोचा कि अवधूत जी के लिये कुछ करना चाहिये - बस आव देखा न ताव और आधी रात को अवधूत जी के कुटिया समान घर में अवतरित हो गये। लोग ये भी कहते हैं कि इमानदार आदमी बहुत चैन की नींद सोता है। प्रभु ने चैन की नींद सोते हुये अवधूत जी को झिझोंड़ झिझोंड़ कर बिस्तर से उठा डाला और बोले - वत्स, मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया। उसी त्रुटि का प्रायश्चित करने के लिये मैं तुम्हें दो वरदान दान में देता हूँ। तुम कुछ भी माँग लो।
अब अवधूत जैसा एक सच्चा देश भक्त भला क्या माँगता - झट से बोल दिया, "हे प्रभु! आप मेरी भारत भूमि से सर्वदा के लिये भ्रष्टाचार गायब कर दो।" ये सुन कर प्रभु चिंतित हो गये और बोले, "मैं स्वयं भगवान हूँ और मुझे ये कहते हुये शोभा नहीं देता कि ये कार्य तो स्वयं भगवान के लिये भी दुष्कर है। परंतु मैं अपनी ओर से भरसक प्रयत्न करूँगा। वत्स ये कार्य करने में थोड़ा समय लगेगा - अभी रात्रि हो गयी है, तुम वापस सो जाओ। सम्भवतः जब तुम कल प्रातः काल उठोगे तो तुम्हारी इक्षा पूर्ति हो चुकी होगी।"
प्रभु के इस आश्वासन के बाद अवधूत अब और चैन की नींद सो गया। अगले दिन जब अवधूत जी सो कर उठे तो बड़ा ही विचित्र नज़ारा था। सारा मोहल्ला, गली, शहर सून सान पड़ा था - सारे नर नारी गायब। पूरे शहर में सिर्फ गाय, गधे, कुत्ते, बिल्ली, सुअर और पशु पक्षी बचे थे। बीच बीच में शिशुओं की रोने की अवाज़ भी सुनाई पड़ रही थी। पर अवधूत जी के पड़ोसी, साथी कर्मचारी, घनिष्ठ मित्र, भाई, सगे सम्बन्धी और रिश्तेदार - सभी गायब - उड़न छू। अवधूत से ये सब सहन न हुआ और उसके ह्र्दय से एक मार्मिक चीत्कार गूँज उठी - हे प्रभु!
लोगों से ऐसा भी सुना है कि अपने भक्तों की करुण पुकार पर प्रभु भागे दौड़े चले आते हैं। कम से कम इस बार तो आ ही गये - वत्स क्या समस्या है? ऐसी गुहार क्यों?
अवधूत ने अष्रुपात करते हुये कहा, "प्रभु! ये कैसी मसखरी? मेरे समस्त पड़ोसी, साथी कर्मचारी, घनिष्ठ मित्र, भाई, सगे सम्बन्धी और रिश्तेदार कहाँ गायब हो गये?"
"वत्स तुम्हीं ने तो वरदान माँगा था कि भारत भूमि से सर्वदा के लिये भ्रष्टाचार गायब कर दो। मैंने वही तो किया।"
"पर प्रभु मैं अपने पड़ोसियों, साथी कर्मचारियों, घनिष्ठ मित्रों, भाई, सगे सम्बन्धियों और रिश्तेदारों के बिना नहीं रह सकता हूँ। मुझे वो सब चाहिये।"
प्रभु ने कहा "तथास्तु", और भारत भूमि पर भ्रष्टाचार वापस आ गया।
- अतुल श्रीवास्तव
शुक्रवार, नवंबर 12, 2010
महानायक - चन्द्रगुप्त मौर्य।
मंगलवार, नवंबर 09, 2010
खाली दिमाग.
मूर्तियाँ
"अब देखो क्रिकेट जैसा खेल जो नीरस होने की कगार पर खड़ा था, उसका भी अमरीकी-करण तो करना ही था – आयातित गोरी बलायें चौका या छ्क्का लगने पर ठुमक ठुमक कर पुरुष जाति के दर्शकों का कैसे मनोरंजन करती हैं। अच्छा आप ये तो मानोगे कि सभी प्राणी महापुरुषों का आशिर्वाद पाने के लिये लालायित रहते हैं, और जब महापुरुष उनके सर पर हाथ रख देते हैं तो अपने आप को धन्य समझने लगते हैं और गर्व से कहते हैं कि फलाँ फलाँ महापुरुष ने स्वयं अपने हाथ से उनको प्रसाद या भभूति दी।"
"हाँ ये सोलहो आना सच्ची बात है।"
"बस सैम जी का भी कुछ कुछ ऐसा ही प्रभाव है। कोई कितना भी बड़ा कलाकार क्यों न हो, पर जब तक सैम अंकल अपने हाथ से भभूति न दे दें तब तक वो महान कहला ही नहीं सकता। या ये भी कहा जा सकता है कि अगर सैम अंकल किसी गधे पर भी भभूति छिड़क दें तो हम सब गर्व से फूल कर गधे को भी पूजने लगते हैं। हम कितने महान हैं या हमने कितनी तरक्की कर ली है इस पर हम तभी विश्वास करते हैं या उसे सच मान लेते हैं जब सैम जी हमें Newsweek, Times या The Economist के जरिये से बताते हैं।"
"बड़े परभावसाली हैं ये सैम चचा तो।"
"सो तो ये हैं ही, वरना हमें शालीन तरीके से गालियाँ बकना कौन सिखाता। जैसे कि शिट, फ# और आसहो@। आप टी वी देखो – लोग क्या धड़्ड़ले से शिट बोलते हैं।"
"ई शिट का बला होवे है?"
"अरे वही जो चिड़ियाँ मूर्तियों पर करती फिरती हैं और आप सुबह सुबह खेतों में करने जाते हो।"
"हा हा हा ई तो बड़ा मजेदार बात हुई। सोचो कोई हमसे पूछे कि भैंसवा का चारा दियो कि नाही और हम कहें – अरे पैखाना, भूल गया... हा हा हा।"
"कल ही मैने एक महानुभाव को टी वी पर एक टी-शर्ट पहने देखा जिसपे लिखा था “FCUK” – अब भाई गाली देने और दिखाने का शालीन तरीका तो हमने सैम अंकल से ही सीखा है न?”
“और बतायें...”
“खिलावन भाई आपकी शादी कैसे हुयी थी...”
"अरे आप तो हमरी दुखती रग पर नमक रगड़ रहे हो। बापू और अम्मा हमार कनवा (कान) उमेंठ कर हमका सावितरिया (सावित्री) संग बियाह दिये रहें।"
“अरे आप समझे नहीं। खैर अब आजकल अगर आप को शादी करनी है तो एक घुटने पर बैठ कर, एक हाथ से हीरे की अंगूठी आगे करते हुये कहना होगा – Will you marry me? और, ये किसने सिखाया? अंकल सैम के हॉलीवुड ने। बॉलीवुड नाम की प्रेरणा किसने दी? अंकल सैम के हॉलीवुड ने।"
“हुजूर आप तो बड़ी गजब की बातें बताये रहे हो...”
"खिलावन भाई आप ही बताओ हम महान हैं कि सैम चाचा? हम पिछले पचास सालों में दुनिया को कुछ न सिखा पाये, पर सैम जी ने हमको खाना, पीना, बोलना, नाचना, गाना और तो और उनकी तरह सोचना भी सिखा दिया और वो भी सिर्फ़ पिछले 10-15 सालों में। हैं न महापुरुष?”
"सही कह रहे हैं आप। मेरे बिचार से तो सैम जी की मुर्तिया तो कौऊनू गली नुक्कड़ मा नाही बलकी मंदिरवा मा लगाई क चाही।"
“तो फिर देर किस बात की है फटाफट बनाओ और स्थापित करो।"
"पर साहिब एक ठो पिराबलम है। यदि सैम जी की मूर्तिया बनाई के मंदिरवा मा लगाई गई तो हमरे देस बासियों को सुहायेगा नहीं। अरे बहुतै (बहुत ही) बड़ा हंगामा हुई जईहै।"
"सो तो है, पर क्या कहें अब ये भारतीय नास्तिक भी हो चले हैं। जिसको अपना रहे हैं, उसी को नकार भी रहे हैं। पर आप मायूस न हों – दिल से तो सब मानते हैं और एक न एक दिन सब एक स्वर में बोलेंगे भी जरूर कि सैम बाबा की जय हो..."
*****
- अतुल श्रीवास्तव
रविवार, जनवरी 17, 2010
असमंजस
कमबख़्त जेबें.
रोज़ की ही तरह आज भी गली में भौंकते कुत्तों ने और गली के नाई के रेडियो पर जोर जोर से बजते “मेरा सुन्दर सपना टूट गया...” गाने ने भारतीय जी की निद्रा को भंग कर दिया। आँख मसलते हुये भारतीय जी ने खटिया का परित्याग किया, पर आज भारतीय जी का मन कुछ खिन्न सा था। बस उसी खिन्न मन से भारतीय जी ने दातों पर दातून मसली, और कुर्ता पैंट डाल कर निकल पड़े सुबह की सैर के लिये – पर आज थोड़ा भुनभुनाते हुये कि किस गधे ने इस जगह का नाम ऐशबाग रख दिया – यहाँ न तो कोई बाग है और ऐसे शोर शराबे में भला कोई ऐश क्या करेगा।
भारतीय जी अभी एक-आधा फर्लांग ही चले होंगे कि अख़्तर मियाँ से टकरा गये। अब क्यों कि मोहल्ले में पानी की किल्लत रहती है इस लिये अख़्तर मियाँ ने पान की पिचकारी से ही गली को धोया और अपना रोज़ सुबह वाला सलाम भारतीय जी की ख़िदमत में ठोंक दिया। अख़्तर मियाँ की गली में ही छोटी सी एक दर्जी की दुकान है – अंजुमन लेडीज़ एंड जेंट्स टेलर्स। अख़्तर मियाँ हमारे भारतीय जी के सदियों से दर्जी रहे हैं; और अख़्तर मियाँ के अब्बू मुश्ताक़ ज़नाब सदियों तक भारतीय जी के पिता जी के कपड़े सिलते रहे – शायद ये संबन्ध और भी पीढ़ियों पुराना है। और, शायद इसी लिये दोनों में अगाढ़ प्रेम और अटूट दोस्ती है।
पर आज भारतीय जी चिडचिड़ाये हुये थे, और ऐसे में जो भी सबसे पहले सामने आता है उसी पर गुस्से का गुबार फूट पड़ता है। और, आज अख़्तर मियाँ का दिन था गुस्से के झोंको को झेलने का।
अख़्तर मियाँ: भारतीय ज़नाब आज किस तरफ का रुख़ है?
भारतीय जी: जहन्नुम की तरफ।
अख़्तर मियाँ: क्या हो गया मियाँ? मिज़ाज़ तो ठीक हैं?
भारतीय जी: मेरे मिज़ाज़ को क्या होगा? अपनी सुनाईये – पैंट की कटाई छंटाई कैसी चल रही है?
अख़्तर मियाँ: ऊपर वाले और आप जैसे कद्र-दानों की दुआ है। काम बढ़िया चल रहा है।
भारतीय जी: हमारे जैसे कद्र-दान ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं।
अख़्तर मियाँ: जनाब ऐसी क्या गुस्ताख़ी हो गयी हमसे?
भारतीय जी: अख़्तर मियाँ ये बताईये आप कितने सालों से मेरे कपड़े सी रहे हैं?
अख़्तर मियाँ: यही कोई बीस-तीस साल से।
भारतीय जी: पर आपको अभी तक पैंट में सही ढंग से जेबें लगानी नहीं आई। हाथ डालो कुछ निकालने के लिये तो निकलता कुछ और ही है – मुझको तो लगता है आप कोई जादू टोना फूँक देते हैं मेरी जेबों में।
अख़्तर मियाँ: अचानक पैंटों की जेबों को क्या हो गया? आज तक तो आपने ऐसी कोई शिकायत नहीं की।
भारतीय जी: क्यों कि आज तक ऐसा कोई हादसा ही नहीं हुआ।
अख़्तर मियाँ: अब पहेलियाँ ही बुझाते रहियेगा या कुछ खुलासा भी करियेगा।
भारतीय जी: अख़्तर मियाँ आप को पता है कि पिछले महिने ही पास मे एक अनाथालय खुला है?
अख़्तर मियाँ: हाँ सुना है कि ...
भारतीय जी (बात काटते हुये): बस कल शाम को उसी अनाथालय के प्रबन्धक महोदय अपने साथ बच्चों का एक काफिला ले कर मेरे घर टपक पड़े...
अख़्तर मियाँ: पर जनाब इस हादसे का मेरी पैंट सिलाई से क्या लेना देना?
भारतीय जी: अरे बीच में मत बोलिये। जो कह रहा हूँ बस सुनते जाईये। प्रबन्धक महोदय - क्या नाम था उनका – हाँ, ज्ञानदत्त । हाँ तो ज्ञानदत्त जी ने सबसे पहले तो दस मिनट तक मुझे ये सुनाया कि हमारे देश में कितने लाखों अनाथ बच्चे हैं जिनके लिये कोई भी, यहाँ तक सरकार भी, कुछ नहीं करती है। कैसे उनका अनाथ आश्रम ऐसे बच्चों की देखभाल करता है, स्कूल भेजता है... अरे आप सुन भी रहे हैं?
अख़्तर मियाँ: अरे आप ही ने तो कहा था कि बीच में मत बोलिये, इसी लिये चुप चाप सुने जा रहा हूँ। पर अभी तक मुझे समझ में नहीं आया है कि इसका पैंटो की जेबों से क्या...
भारतीय जी: ज्ञानदत्त जी ने ये भी बताया कि अनाथ आश्रम का खर्चा पानी सामान्य नागरिकों के दान के फलस्वरूप ही चलता है, और ये कहते कहते उन्होंने पीछे छिपे हुये कुछ एक दयनीय बच्चों को पीछे से घसीट कर मेरे सामने ला खड़ा कर दिया। फिर अपने झोले से एक पेन और रजिस्टर निकालते हुए बोले - भारतीय जी, इस अनाथ आश्रम को चलाने में हमारी कुछ मदद कीजिये और सौ, हज़ार रुपये का दान दे दीजिये। बोले – ये बड़ा पुण्य का काम है – मानवता और देश दोनों के लिये।
अख़्तर मियाँ: वो तो सब ठीक है, पर इसका पैंट की जेबों से क्या वास्ता?
भारतीय जी: अरे सुनिये भी तो। मैंने उनकी दिल खोल कर सराहना करी। फिर अपनी पैंट की बाँयी जेब में हाथ डाला। और जब हाथ बाहर निकाला तो मुट्ठी भर दया निकल आई पर ससुरा मेरा बटुआ नहीं निकला। कई बार कोशिश करी, हाथ कई कई तरीकों से डाला, पर कमबख़्त बटुआ तो जैसे कसम खा के बैठा हो कि उसे निकलना ही नहीं है। पर मियाँ गौर करने वाली बात ये है कि दया नॉन-स्टॉप निकलती रही।
अख़्तर मियाँ: अब बात कुछ कुछ समझ में आ रही है...
भारतीय जी: फिर मुझे याद आया कि दायीं जेब में कुछ रुपये रखे हैं। जब दायीं जेब में हाथ डाल कर रुपये निकालने की कोशिश करी तो जेब से ढेर सारी सराहना और तरीफों के पुल तो निकल आये पर रुपये न निकले। फिर से कई बार कोशिश करी, पर रुपये तो मानों जेब से ऐसे चिपक गये थे जैसे अमर सिंह के साथ अमिताभ। हाँ, पर सराहना निकलनी बंद न हुई।
अख़्तर मियाँ: जनाब आपको पूरा यकीन है कि इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ आपके साथ – खासकर के जब कोई आपसे पैसा माँगने आया हो...
भारतीय जी: अरे कभी नहीं मियाँ, कभी नहीं। हाँ ये बात जरूर है कि इससे पहले हमेशा लोग धार्मिक चीजों के लिये पैसा माँगने आये – कभी मंदिर निर्माण के चंदे कि लिये तो कभी माता जागरण, अखंड रामायण और पूजा पाठ जैसे पुण्य कामों के लिये। और, हमेशा मेरी जेब से भक्ति और श्रद्धा के साथ साथ बटुआ भी निकला। यहाँ तक कि चेक बुक भी निकल आई जो कि मैं कभी जेब में रख कर घूमता ही नहीं हूँ। अख़्तर मियाँ मुझे पूरा यकीन है आप जेबों पर जरूर कोई जादू टोना फेरते हो।
अख़्तर मियाँ: भारतीय बाबू ये कोई जादू टोना नहीं है। असलियत तो ये है कि आपकी जेबों में ऊपर वाले के लिये तो जगह है, पर शायद इस ज़मीन पर रहने वालों के लिये नहीं...
इसी बीच दुकान से तौकीर बाहर निकल कर आया और भारतीय जी से बोला – आपने परसों एक पैंट सिलने को दी थी। क्या कहते हैं पीछे एक हिप पॉकेट लगा दूँ?
भारतीय जी कुछ बोलते उससे पहले ही अख़्तर मियाँ बोल पड़े – अरे जा और दोंनो ओर हिप पॉकेट लगा दे। और, उनके ऊपर फ्लैप मत लगईयो, हो सके तो जेबों का साईज़ भी बड़ा ही रखना – क्या पता अगली बार इन्हीं जेबों से भारतीय जी का बटुआ निकल आये।
बात आगे बढ़ती उससे पहले ही सड़क के बीचों बीच खड़े हनुमान मंदिर के लाऊड स्पीकरों से भजनों का प्रसारण प्रारम्भ हो गया। बस भारतीय जी ने अपनी दोनों जेबों में हाथ डाला और दौड़ पड़े मंदिर की ओर माथा टेकने और नमन करने।
- अतुल श्रीवास्तव