बुधवार, जनवरी 02, 2019

निवेदन

इतराती पवन, न बन तू इतनी बावली,
मंडराते श्यामल मेघों को तनिक थम जाने तो दे।

कर आलिंगन बन जा तू भी थोड़ी साँवली,
इन देवों को गरज कर अमृत बरसाने तो दे॥

शाँत हो, यूँ क्यों हो रही तू उतावली,
नभ से अम्बुद का मकरंद थोड़ा निचुड़ जाने तो दे।

जल को तरसे नर, नारी, हर नगरी की बाओली,
थम जा, क्षुधा थोड़ी सी धरा की बुझ जाने तो दे।

भगाना नहीं, उड़ाना नहीं, इन श्याम देवों को तो है तुझे बहलाना,
फिर सरिता की तरंगों पर उमंगों की पतवार ले स्वच्छंद लहराना।

गिरती जलद मोतियों को अपने आँचल से इधर उधर बिखराना,
हो जाये वसुधा जब भूरी से हरी, तब फिर पंख लगा सबको सहलाना।

इतराती पवन, न बन तू इतनी बावली,
उठते हाथों पर कुछ एक बूँद जल की गिर जाने तो दे।।


- अतुल श्रीवास्तव

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