शुक्रवार, जनवरी 04, 2019

वैतरणी

क्यों वैतरणी के पार की सोचूँ, क्यों उस लोक का द्वार मैं खोजूँ?
मुझे अभी धरा पर रहना है, मनुष्य तो हूँ पर मानव बनना है।

परलोक भी है क्या कोई कहीं, मिथ्या तो नहीं, कोई छल तो नहीं?
स्थिर क्यों बैठूँ एक कुंड समान, मुझे एक सरिता बन कर बहना है।

क्या सुनी सुनाई को मैं मानूँ, या इस जग के अचरज को पहचानूँ?
एक पंछी बन विचरण करना है, अपनी गाथायें कहना है।

उस जीवन पर क्यों चिंतित रहूँ, क्यों इस जीवन में भ्रमित रहूँ?
बादल हो पर्वत पर जाना है, हिम बन कर शिखर पर गिरना है।

यज्ञ हवन से क्या कुछ होता है, होता तो हर प्राणी क्यों रोता है?
अभी तो सब वर्णों को अपनाना है, एक इंद्रधनुष बन जाना है।

क्या स्वर्ग सजा ऊपर है कहीं, दिखता न वो तुझको क्यों न यहीं?
इस स्वर्ग में एक झरना बनना है, मुझको घाटी में निर्झर झरना है। 

क्यों वैतरणी के पार की सोचूँ, क्यों उस लोक का द्वार मैं खोजूँ?
धरणी के विस्तृत सौंदर्य में अभी भटक भटक स्व को पाना है।


- अतुल श्रीवास्तव

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